Monday, October 1, 2018

इक दुनिया अक्सर खोजता हूँ..

इक दुनिया अक्सर खोजता हूँ..

सभ्यताओं से परे,
समाजों-रस्मों-रिवाजों से परे..
न जात न भेद,
जहाँ कोई 'दौलत' तक न हों..
न गुजरा न आने वाला कल हो,
जहाँ रोज बस आज हो..
संस्कृतियों का मिथ्या दम्भ न हों,
जहाँ सम जीव हो, सरल जीवन हो..

इक दुनिया अक्सर खोजता हूँ..
कटुताओं से परे,
द्वैष-परिवेश-विशेष से परे..
न आम न खास,
जहाँ कोई 'ओहदा' तक न हो,
न सूद हों न सूदन हों,
जहाँ सिर्फ एक ईश्वर हो..
भाँति-भाँति के आडम्बर न हों,
जहाँ नम चित्त हो, नयन पावन हों..

इक दुनिया अक्सर खोजता हूँ..

Friday, January 19, 2018

पुस्तक समीक्षा : स्वराज

..और अरविन्द केजरीवाल की पुस्तक 'स्वराज' समाप्त की। इस पुस्तक के बारे में दो बातें प्रारम्भ में ही इंगित कर देनी चाहिए - सबसे पहले तो यह बता देना जरूरी होगा कि सम्पूर्ण पुस्तक सत्ता के विकेंद्रीकरण पर जोर देती है। दूसरी अहम् बात ये है कि पुस्तक में जो थ्योरी दी गई है वह अपने आप में कोई नई थ्योरी नहीं है बल्कि यहीं थ्योरी आज से बरसों पहले महात्मा गाँधीजी बता चुके हैं।

यह सच है कि सरकारी तंत्र में पग-पग पर खामियाँ हैं और कई प्रकार की खामियाँ नित नए-नए (नागरिकों हेतु गैर-लाभकारी किन्तु सरकारी अधिकारियों-मंत्रियों हेतु अति-लाभकारी) कानूनों और बिलों को पास करवा कर इजाद भी की जा रही है। तमाम तरह के क़ानून केंद्र में बनते हैं। योजनाएं केंद्र में बनती हैं। अधिकांश योजनाओं का अधिकांश गाँवों-कस्बों की मुख्य समस्याओं से कोई लेना-देना नहीं होता। वे बस बनाई जाती है ताकि मंत्रियों और बड़े अधिकारियों की आर्थिक तकलीफें दूर हो सके। पुस्तक कहती है कि इसके बजाय प्रत्येक गाँव में ग्राम सभाओं को उनकी असली ताकत मंजूर होनी चाहिए और इन तमाम योजनाओं की बजाय एक मुक्त रकम सीधे ग्राम सभाओं को मिलनी चाहिए। इसके बाद हर उस गाँव के नागरिक स्वयं ग्राम सभा में सरपंच के आगे तय करें कि उन्हें कितनी रकम स्कूल के लिए चाहिए, कितनी निम्नतम आय वाले उस गाँव के उनके द्वारा चयनित किए गए गरीब और बेसहारा लोगों को सहायता देने के लिए चाहिए, कितनी रकम जरुरतमंदों को विभिन्न ऋण योजनाओं के नाम पर आवंटित की जाए, कितनी रकम किस विकास पेटे में दी जाए। यानि सबकुछ ग्राम सभा तय करे और सरपंच मात्र उस निर्णय पर अपनी मोहर लगाए, इसी को स्वराज कहा गया है।

पुस्तक केवल मात्र थ्योरी पर नहीं चलती, वरन् कितनी ही केस स्टडीज भी समाहित किये हुए हैं। महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गाँव का उदाहरण उनमें सबसे अनोखा और बेहतरीन है, जिसमें गिरते जा रहे सामाजिक मूल्यों और नैतिक पतन में ख़त्म होते उस गाँव के कुछ किशोर लड़के कैसे खुद आगे आकर एक संगठन निर्माण करने की योजना तय करते हैं और अपने में से एक नौजवान को सरपंच चुनने के बाद तमाम निर्णय लेने के लिए ग्राम सभा करवाने की योजना बनाते हैं। प्रारम्भ में जिसमें इक्के-दुक्के लोग ही हिस्सा लेते हैं लेकिन बाद में धीरे-धीरे लोग आने लगते हैं जब वे देखते हैं कि यहाँ तो अपने बच्चों की शिक्षा के लिए भी बजट बनाया जाता है। एक समय के बाद हिवरे बाजार गाँव की रंगत ही बदल गई।

पुस्तक यह भी कहती है कि आज होता यह है कि गाँव में सबसे शक्तिशाली ग्राम-सभा नहीं बल्कि गाँव का सरपंच होता है और जो सरपंच लिख दे उसे ग्राम-सभा द्वारा अनुचित ठहराने के लिए कोई विकल्प ही नहीं है। आज ग्राम सभा तो होती है किन्तु कहीं भी ग्राम सभा को कोई शक्ति नहीं है। पुस्तक में कई केस बताए गए हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि आज ग्राम-सभाओं को वाकई में सरपंच के चंगुल से निकालकर खुद सरपंच को ग्रामसभा की मुहर बनाए जाने की सख्त जरुरत है। यदि ग्राम सभा को मुक्त रकम मिले, यदि अधिकारियों को दण्डित करने की शक्ति मिले, यदि सरपंच को भी वापिस बुला लेने की शक्ति मिले तो हर गाँव वाले अपनी असली जरूरतों के आधार पर और उपलब्ध मुक्त फंड की रकम को तरीके से नियोजित करते हुए खुद बेहतर ढंग से अपनी खुद की योजनाएं बना सकेंगे। इससे स्वास्थ सेवाओं का स्तर सुधरेगा, शिक्षा का स्तर सुधरेगा, नशाबंदी में सफलता मिलेगी, नक्सलवाद से छुटकारा मिलेगा, गरीबी-भुखमरी-बेरोजगारी का दमन हो सकेगा।

पुस्तक में विकेंद्रीकरण की इस जबरदस्त थ्योरी पर उठने वाले संशयों, संदेहों और सवालों पर भी जवाब दिए गए हैं। यह वर्तमान सिस्टम की खामियाँ बताती है, विकेंद्रीकरण द्वारा उनके व्यावहारिक हल भी बताती है। यह पुस्तक इसलिए पढ़ी जानी चाहिए ताकि हम जान पाएं कि दिखाए जाने वाले प्रलोभनों और राजनितिक योजनाओं के परे एक 'स्वराज' भी कहीं ओझल हो रहा है, जिसे ढूँढना बेहद जरुरी है। बरसों पहले एक बूढा फ़क़ीर भी हमें यहीं स्वराज दिखाता-दिखाता ओझल हो चुका। अन्यथा इस पीढ़ी की वर्तमान हालत को देखते हुए अगली पीढ़ी से यहीं उम्मीदें रह जाएंगी कि वह कम से कम पर गुजर करना सीख ले। पाँच सालों में वह उस नेता को वोट दे जो अच्छी बात कहता है और जिसका चुनावी एजेंडा भी दमदार है, बजाय इतना भी सोचे कि वह नेता अपनी पार्टी का एक मोहरा है और चुनाव जीतने के बाद वह अपनी पार्टी की ही सुनेगा। पार्टी केंद्र में शक्ति चाहती है ताकि केंद्र से वह समूचे राष्ट्र पर निगरानी रख सके। वह 'अपना अस्तित्व' बनाए रखने के लिए योजनाएं लागू करती है किसी जरूरतमंद का अस्तित्व बनाए रखने के लिए नहीं। अंत में पुस्तक के आखिरी पेज पर लिखी चंद पंक्तियाँ साझा करना चाहूँगा..

"सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए बीस लोग नहीं चला सकते। सत्ता के केंद्रबिंदू दिल्ली, बंबई और कलकत्ता जैसी राजधानियों में है। मैं उसे भारत के सात लाख गाँवों में बांटना चाहूँगा।"
- महात्मा गाँधी


Sunday, January 14, 2018

कभी-कभी मन करता है.. (भाग-1)

कभी-कभी मन करता है, ईश्वर से कहूँ मुझे आपसे कुछ बातें जाननी है। क्या होगा अगर वे मुझे ऐसा मौका दे दें! मैं उनके पास बैठूं, उनसे अपने उन तमाम अनुत्तरित प्रश्नों को साझा करूँ। जानना चाहूँ वो क्या प्रत्युत्तर देते हैं और ठीक उस वक़्त जब वो जवाब दे रहे हों, उनके मनोभाव गौर से देखने की कोशिश करूँ। फिर सोचता हूँ - लेकिन मेरे प्रश्न क्या होंगे? अनेकानेक प्रश्नों में से उस बेहद खास और सीमित समय में किनका चयन करूँगा हल जानने और जिज्ञासा तृप्त करने के लिए?

शायद मैं पूछूँगा कि हमें बनाने के पीछे आपका मकसद क्या रहा था? या कि खुद आपको हमने बनाया है? इन दो में से एक का जवाब हजारों सवालों के जवाब मुझे दे सकेगा। यदि ईश्वर ने हमें बनाया है तो एक बेहद अहम् जिज्ञासा को कौतुहलवश उनसे साझा करूँगा, वो यह कि हम मनुष्य बिना मकसद के जन्म लेते हैं और समझ-बोध प्राप्त होने तक जिम्मेदारियों में उलझकर बाद में आगे की सारी जिंदगी अपने मकसद को खोजने में खपा देते हैं, आखिर क्यों पहले से हमारा कोई मकसद नहीं होता? ऐसे में पग-पग पर कष्टों से भरे इस जग में हमें इस कदर लाने का आखिर औचित्य क्या हो सकता है? क्या मनुष्य जीवन से पहले भी हमारा कोई जीवन रहा होता है, जिसमें कि दुःख-दर्द न होते हों केवल स्वास्थ्य-सुख और तमाम भोग और ताकतों के साथ गुजर करते हों या ऐसा ही कुछ और उस जीवन में हम अपनी जिम्मेदारियां ठीक से न चुकाने के बदले फिर मनुष्य जीवन में परीक्षा देने आते हैं? यह बेवकूफी भरा प्रश्न लग सकता है लेकिन यहीं एक प्रश्न है जो मुझे अक्सर कुरेदता है। हम लोग इस तरह यहाँ क्यों हैं? ऐसे जीवन में इस तरह से हमारी परीक्षा क्यों, हम ही क्यों? हाँ बड़े सज्जन लोग और कईं बड़े-बड़े महात्मा यह कहते हैं कि हमारे जीवन का मकसद अपने आस-पास सबको खुशियाँ बांटना है। लेकिन जब हम ही हमारे समाज में खुश नहीं रह पाते, आने वाले कल और आने वाली पीढ़ी की चिंताओं में अपनों को भी सदैव खुश नहीं रख पाते तो दुनियाभर के ज्ञान खोखले लगने लगते हैं। उसके बाद जिम्मेदारियों की चादर दिन-ब-दिन स्वतः मोटी होती जाती है। क्यों जन्म के समय ही हमें एक मकसद नहीं दे दिया जाता? हम अपने ही पूर्वजों से पाए हुए मकसद ढो रहे हैं, लेकिन कैसे जानें कि वह कितना सार्थक है?

इसके बाद में जानना चाहूँगा कि आपको मिलने वाली अनगिनत प्रार्थनाओं, याचनाओं, विनतियों और निवेदनों में से आप कैसे तय करते हो कि किसे और कितना सुना जाए एवं तत्पश्चात किसे, किस तरह से और कितनी मदद दी जाए? इसे कैसे अंजाम देते होंगे आप? यह कितना पेंचीदा और कठिनतम कार्य है। एक ही समय में एक ही मसले पर दो या दो से अधिक लोगों की विरोधाभासी प्रार्थनाएं भी आती होंगी। तब क्या क्राइटीरिया मायने रखता है। ऐसे में एक याचक अगर खूब दिखा-दिखाकर भक्ति में लीन हो, जरुरत से ज्यादा पैसों या सोने-चाँदी से अपनी भक्ति जाहिर करे और दूसरा याचक अपनी दैनिक जिम्मेदारियों की भागदौड़ में हांफता हुआ आपकी भक्ति के लिए समय ही न निकाल सके तो आप कैसे तय करते होंगे कि किसकी और कितनी मदद की जाए? आज जब विश्वभर में जीवनयापन इतना व्यस्त और महंगा चुका है कि लोग अपने बच्चों तक के लिए समय नहीं निकाल पाते, तब ग्रंथों को पढ़ने या ईश्वर-भक्ति में घंटों लगा देने वाला समय हर किसी के बस में तो है नहीं। तो क्या आज के युग में भक्ति के नियम भी बदलें हैं कि नहीं? क्या यह पहले की तरह ही हैं या कि आप दूसरे पहलुओं पर भी गौर करते हैं जैसे - व्यक्ति की जिम्मेदारियां, उसका मन, मन के भीतर का मैल, जोड़-घटाव, तनाव, चिंताएं, साहस, इच्छाएँ इत्यादि। आज के समय में मेरे विचार में भक्ति का गणित भी अब बदला ही होगा। यह जानना बेहद रोचक और अर्थपूर्ण होगा।

मैं यह भी पूछूँगा कि कुछ लोग ईमानदारी से जीते हुए सारी जिंदगी कष्ट भोगते हुए बिता देते हैं, उन्हें आपसे सदैव उम्मीदे रहती हैं कि आप उनके दुःख जल्द दूर करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। मैंने देखा है उनमें से कईं तो यूँ ही गुजर जाते हैं। ऐसा क्यूँ होता है? तो क्या आप मदद करते भी हैं या कि इससे सारे सिस्टम में छेड़छाड़ हो जाएगी इसलिए नहीं करते? मैंने गीता पढ़ी है और कुछ दुसरे धर्मों के ग्रंथों का सार भी सुना-पढ़ा है और सबका सार यहीं जताता है की जो भी हम भोगते हैं चाहे वह सुख हो या पीड़ा, सब कुछ हमारे ही कर्मों का फल है। मुझे तार्किक दृष्टिकोण से यह बात बहुत संजीदा लगी। यदि कोई दुःख, किसी प्रकार की कोई सजा भी जीवन में मिले तो वह अपने किए बुरे कर्मों के प्रति ही मिले। ऐसा ही होना चाहिए, लेकिन फिर 'पुनर्जन्म' नाम की एक अजीब ही संज्ञा सामने आ जाती है। किसी ने जन्म लिया। नई जीवनरेखा शुरू हुई। और उस नन्हे शिशु को जन्मजात कोई रोग! बड़े सज्जन और बड़े-बड़े महात्मा की मानें तो पिछले जन्म के कर्मों का नतीजा! क्या वाकई पुनर्जन्म नाम की कोई चीज़ है? क्या वाकई कष्ट या सुख भोगने संबंधी पिछले जन्म का इस जन्म से और इसका अगले आने वाले जन्म से कोई लिंक होता है? अगर ऐसा सच में है तो मैं इस चीज़ के लिए सदा आपका आलोचक रहूँगा। आखिर क्यूँ? जब उसे मालूम ही नहीं है कि उसने क्या गुनाह किया था, तो फिर ऐसी सजा के क्या मायने? और अक्सर तो देखने में आता है कि कुछ बच्चे अपनी सारी जिन्दगी उस एक दोष, उस एक पीड़ा, उस एक सजा को लिए निकाल देते हैं जिससे उनका यह सारा जीवन पग-पग पर उन्हें अन्य कितनी ही तरह की मानसिक सजाओं का भोगी बनाए रखता है। उन्हें पता तक नहीं होता कि ऐसा उनके साथ क्यूँ हुआ? ऐसे में जब कभी कहीं किसी दुर्घटना में नन्हे-नन्हे शिशु दुःख भोगते हैं तो पुनर्जन्म नाम की यह संज्ञा आँखों के सामने आ जाती है। अगर पुनर्जन्म नाम का कुछ भी नहीं है तो फिर सवाल आप पर उठता है कि उन निर्दोषों के साथ ऐसा क्यूँ होता है? फिर आपके होने के क्या मायने है और हमें क्यूँ आपको पूजना चाहिए? दरअसल कुछ मामले इतने विचलित कर देने वाले होते हैं कि मन-मस्तिष्क उस पर ईश्वर से संज्ञान लेना चाहता है।

अक्सर मन कितने ही अनगिनत प्रश्न करता है। उनमें से कईं मेरे अपने ईश्वर के लिए होते हैं। मैं अपने ईश्वर में पूर्ण श्रद्धा रखता हूँ लेकिन अंधश्रद्धा नहीं रख सकता जैसा कि अपने आसपास लोगों को अक्सर रखते देखता हूँ। मैं प्रश्न करना चाहता हूँ क्यूंकि उन्हीं ने मुझे इतना जिज्ञासु बनाया है। बीते समय में मेरे काफी प्रश्नों के जवाब मुझे दिए भी गए हैं। काश कभी उनसे इनके उत्तर मिल सके। कुछ इस तरह के प्रश्नों के उत्तर जानना चाहूँगा यदि मौका मिले, क्यूंकि,

कभी-कभी मन करता है...


Saturday, October 21, 2017

पुस्तक समीक्षा : Men are from Mars Women are from Venus

..और John Gray की पुस्तक Men are from Mars, Women are from Venus समाप्त की। मैंने पुरुष और स्त्री के आपसी तालमेल और सम्प्रेषण पर इससे पहले कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी। यह पुस्तक बाहर से बेहद आकर्षक और ललचाती-सी होने के साथ-साथ काफी चर्चित भी है। इसके बारे में शायद ही कोई पुस्तक प्रेमी अनजान हो। लेकिन बावजूद इन सब सकारात्मक पहलुओं के, यह पुस्तक निरी ढेर सारी गैर-जरूरी सामग्री के शब्दों का पहाड़ ही है। मेरे शब्द इस समीक्षा-आलेख में कुछ कड़वे हो सकते हैं किन्तु यह मेरे इसे पढ़ने पर हुई अनुभूति के हूबहू उकेरे जाने के कारण बिना किसी प्रभाव या लाग-लपेट के होने से ऐसे हैं। यह पुस्तक दरअसल अलग कुछ भी नहीं कहती जो आप नहीं जानते। अगर दिल की बात खुल के हूबहू कह दूँ तो मैं साफ-साफ कहूंगा कि खुद मेरे पुस्तक-संग्रह में यह पुस्तक अब तक की सबसे नीरस पुस्तक रही, बल्कि 'कुछ भी परोसकर' इसने चेतन भगत की पुस्तकों को भी मात दी है।

पुस्तक के शुरू के कुछ पेजेज़ यह बताते हैं कि पुरुष असल में मंगल का वासी है और स्त्री शुक्र की वासी। दोनों अपने-अपने ग्रहों पे अपने-अपने नियम और कायदों के साथ खुशी-खुशी रहते हैं। फिर एक दिन पुरुष शुक्र खोज लेते हैं और एक यान से वहाँ पहुंचते हैं। दोनों के मन और दिल एकदम से हिचकोले खाते हैं। फिर दोनों पृथ्वी पर आते हैं। इसके बाद से अब तक पुरुष अपने मंगल ग्रह के नियम से ही स्त्री के विचारों का विश्लेषण करता है जबकि स्त्री इसी तरह अपने शुक्र ग्रह के नियमों के अनुसार। यहाँ तक भी यदि लेखक की अपनी बनाई यह थ्योरी इसलिए मान लेते हैं कि पुरुष और स्त्री वास्तव में एकदम अलग-अलग तरह से सोचते हैं, तब भी लेखक इसके बाद इतने भ्रामक, अस्वाभाविक, असामान्य और अविश्वसनीय नियम लागू करने को कहता है कि जो रिश्ता मज़बूत करने कि बजाय व्यावहारिक रूप में इसे कमज़ोर कर सकते हैं।

कईं दफे स्त्री से तो पुरुष को ज्यादा स्वायत्तता और अहमियत दी गई है जो इस पुस्तक की महिला पाठकों को साफ-साफ दिखाई देंगी। इसके अलावा शुरू के ही एक चैप्टर में बताया गया है कि यदि पुरुष को ठेस पहुंचती है या वह नाखुश है तो वह अपने प्राचीन मंगल निवास के समय अनुसार अपनी गुफा में चला जाएगा और उस समय स्त्री उसे न मनाए न ही समस्या पर बात करे। इसके बजाय उसे उसके हाल पे अकेला छोड़ दें। वह शॉपिंग पे जा सकती है या टीवी देख सकती है। पुरुष स्वतः अपनी समस्या पर मानसिक विश्लेषण कर जब हल निकाल लेगा तब वह अपनी गुफा से निकल आएगा और सामान्य व्यवहार करने लगेगा। ऐसे में रिश्ता मज़बूत होगा कि कमज़ोर? इस तरह से भ्रामक सिद्धांतों और अनोखी कल्पना पर आधारित निष्कर्ष व्यवहार में प्रयोग करने से अत्यंत नाजुक इस रिश्ते पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के भी अत्यधिक आसार बनते हैं।

इस पुस्तक में जो भी कुछ है वह शुरू के चंद पेज में ही मिल जाएगा, उसके बाद वहीं बातें, वहीं नियम-सिद्धांत जो अपनाने को लेखक कहता है, समूची पुस्तक में उन्हें बार-बार, फिर बार-बार और फिर बार-बार नए-नए तरीकों से एवं नए-नए शब्दों के जरिए पुनरावृत्ति कर सिर्फ पुस्तक में पृष्ठ संख्या बढ़ाई गई है। पढ़ते-पढ़ते दिमाग ऊँघने लगता है कि यहीं बात और कितनी बार पढ़ने को मिलेगी। आधी पुस्तक होने तक आप पुस्तक को रख देना चाहेंगे। दरअसल इसे पुस्तक के रूप में बनाया गया है जबकि ये नियम किसी अखबार में आने वाले साप्ताहिक रंगीन पारिवारिक परिशिष्ट में छपने वाले एक छोटे-से कॉलमरूपी आलेख में समाहित हो सकने जितनी सामग्री का ही अति-विस्तारित रूप है, बस।

दुनिया में कुछ पुस्तकें सबसे ज्यादा बिकती है। वे ज्यादातर धार्मिक ग्रंथ होते हैं और बाईबल का नाम उनमें सबसे ऊपर आता है। कुछ पुस्तकें उनकी रेटिंग को देखते हुए सबसे ज्यादा खरीदी जानी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं हैं। वे महान साहित्यकारों की कृतियाँ होती है जिन्हें आम नागरिक पूरी तरह समझ और सराह नहीं पाता। मसलन शेक्सपियर का लेखन। कुछ पुस्तकें बेहद बिकती हैं और एक-दूसरे को गिफ्ट की जाती है या सलाह के तौर पे बताई भी जाती हैं कि इसे पढ़ो। वे वास्तव में शानदार होती हैं। मसलन How to Win Friends and Influence People, महान लोगों की जीवनियां वगैरह। इसके बाद कुछ पुस्तकें ऐसी भी होती हैं जो सबसे ज्यादा चर्चित होती हैं, इसलिए बिकती भी हैं, किन्तु उनके भीतर कुछ भी नहीं होता। वे चर्चित होती हैं उनके आकर्षण के लिए जिस पर सारा जोर दिया गया होता है, बजाय कि लेखन पे। ऐसी ही एक आकर्षक पुस्तक है John Gray की 'Men are from Mars, Women are from Venus'.

Monday, September 25, 2017

पुस्तक समीक्षा : गबन

..और हिंदी साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की पुस्तक 'गबन' समाप्त की। गोदान में जहाँ ग्रामीण कृषक जीवन के विभिन्न रंगों को देखने का मौका मिलता है वहीं गबन आपको भारतीय मध्यम परिवार के रंग दिखाती है। यहाँ भी दुःख-दर्द के बीच मानव जीवन में गहरी जड़ें पसारे लालसाओं और भ्रष्ट आचारों के बादल बार-बार बरसते दिखाई पड़ते हैं जिनके कारण जीवन की सरलता और सौम्यता लगातार प्रभावित होती है और यह निम्न स्तर को गिरती चली जाती है।

मूल रूप से यह स्त्री के आभूषण प्रेम की लालसाओं को केंद्र में रखती गाथा है जो परिवार के सर्वनाश की ओर बढ़ती चली जाती है। इसके अलावा भ्रष्टाचार के बद से बदतर रूप, बीमारी का धीमा जहर और इसकी प्रचंडता वाली काली रात और अपने अस्तित्त्व को साबित करता तो कभी नकारता 'प्रेम' तत्त्व भी इस गाथा को बराबर प्रभावित करते रहते हैं। किरदारों को तो इतनी सूक्ष्म मीनाकारी से गढ़ा गया है कि मुझे नहीं लगता अंग्रेजी साहित्य में भी कहीं ऐसी बारीकियां देखने को मिलती हो। यह उपन्यास भी मानवीय संवेदनाओं का एक खास म्यूजियम है जहाँ कोई जीवन के उन तमाम अहसासों को उन तमाम भावों को जीता जाता है, जो हमारे दैनिक यथार्थ जीवन में हम अक्सर देखते महसूस करते रहते हैं।

इसे इसलिए पढ़ा जाना चाहिए ताकि हम हमारे जीवन मे उन समस्त लालसाओं को एक तीसरे पक्षकार की नज़र से देख सकें, जो हमारी मानसिक सोच को निम्न स्तर की ओर धकेल रहीं हैं और जिसके फलस्वरूप हमारे रिश्ते और फिर हमारा जीवन और इसकी दीर्घकालिक खुशियाँ भी धीरे-धीरे रंगहीन होने को अग्रसर हो रहे हैं। यह इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि कभी-कभी रिश्तों में हम कुछ जरूरी संवादों को इसलिए करने से रह जाते हैं कि उससे कहीं सामने वाला अपना बुरा न मान जाए और केवल इसलिए हम चुप्पी कर लेते हैं। यहीं चुप्पी आगे चलकर दीर्घ दुष्परिणाम से हमारा स्वागत करती है। कुल मिलाकर हिंदी साहित्य जगत का एक बेहद संवेदनशील और अनमोल उपन्यास है 'गबन'।

Thursday, September 14, 2017

14 सितंबर : हिंदी दिवस

इस विश्व में ठौर-ठौर पे अलग-अलग भाषाएँ हैं।
मैंने फिर भी, हिंदी जैसी सुन्दर भाषा कहीं नहीं देखी।
सबसे खास बात, यह बिंदी लगाती है। हिंदी में से बिंदी निकाल लो तो हिंदी, 'हिंदी' नहीं रहेगी। 14 सितंबर, 1953 से प्रतिवर्ष यह दिन हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 14 सितंबर व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्मदिवस भी है जिन्होंने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की दिशा में अथक प्रयास किया।

हमारे देश में अंग्रेजी के पाठक 15 प्रतिशत से भी कम हैं, लेकिन अंग्रेजी अख़बार में विज्ञापन देना हिंदी अख़बार के मुकाबले कहीं ज्यादा महंगा है। लगभग हर माध्यम में विज्ञापन आंशिक या पूर्ण रूप से अंग्रेजी में परोसा जाने लगा है। लगभग हर उत्पाद की पैकेजिंग अंग्रेजी में पोती हुई मिलती है। लगभग हर दुकान, हर ऑफिस की होर्डिंग अंग्रेजी में लगी मिलती है। कुल मिलाकर अपने ही देश में हिंदी को अंग्रेजी के सामने निचले दर्जे की भाषा हम सब ने अपने व्यवहार में साबित कर दिया है लेकिन यह जानना भी आश्चर्य होगा कि यहीं भाषा फ़िजी, मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम, नेपाल में भी बोली जाती है। फ़िजी में तो इसे आधिकारिक भाषा का दर्ज़ा प्राप्त है। फिर न जाने क्यूं हम इसे अंग्रेजी के सामने हीन बना देते हैं।

मुझे वे दिन याद है जब नजदीक के एक शहर में जब मेरी नौकरी लगी थी और मैं ट्रेन से घर और ऑफिस के बीच साप्ताहिक यात्राएँ किया करता था, हिंदी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार तब मैं बड़े ही असहनीय और निराश मन से अक्सर देखता था। ऐसे ही एक वाक़या मुझे याद आता है। मैं उस दिन ट्रेन के प्लेटफॉर्म को अलविदा करने के उन आखिरी पलों में, अपनी टिकट और बैग के साथ किसी तरह साधारण श्रेणी की बोगी में घुसकर सांस मात्र ले रही अच्छी-खासी भीड़ का हिस्सा हो सका। जाहिर है अगले किसी स्टॉप से पहले तो सीट मिलना नामुमकिन ही था। सफर खड़े-खड़े झेलना था। मेरे ठीक बायीं ओर एक 20-22 साल का नौजवान बड़ी ही बेबाकी, तसल्ली और मुस्कुराहट के साथ अपने फोन पे अपनी गर्लफ्रैंड के साथ गपशप में सफर काट रहा था। अगले डेढ़ घंटे मुझे खड़े-खड़े सफर ने नही, उसके फोन ने नहीं, उसकी बातों ने नहीं, बल्कि उसकी अंग्रेजी ने अधमरा कर दिया। उसे हिंदी आती थी मगर जिस जबरदस्ती से वह अंग्रेजी का 'उत्सर्जन' कर रहा था, मेरा मानना है कि दुनिया का कोई भी अंग्रेजी का शिक्षक उसे अंग्रेजी नहीं सीखा सकता। उसकी वोकेबुलरी बहुत ही सीमित थी और वो उन्हीं सीमित शब्दों से बड़ी ही निर्ममता और जबरदस्ती से अंग्रेजी घिस रहा था। खैर, रोज रोज की भागदौड़ में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं लेकिन मैं मुख्य विषय पर आता हूँ- एक विदेशी भाषा को आखिर क्यूं इतनी अहमियत देना चाहते हैं हम? क्या व्यक्तिगत विकास हिंदी में संभव ही नहीं? क्या हिंदी के बजाय अंग्रेजी में बात करने से आपकी क्लास ऊंचे दर्जे की हो जाती है? क्या अंग्रेजी में हिंदी से अधिक व्यापकता, सभ्यता, तमाम तरह के भाव और रसों का पुट है?

कम से कम मैं तो ये नहीं मानता। भारत देश का साहित्य जगत कितने ही भारतीय अंग्रेजीदा साहित्यकारों को एक पलड़े में बिठाकर तौल लो, दूसरे पलड़े में अकेले मुंशी प्रेमचंद के आगे हल्का है। भारत देश के तमाम अंग्रेजीदा राजनेताओं के समस्त अंग्रेजी उवाचों को एक पलड़े में एक साथ तौल लो, हिन्दीभाषी अकेले अटल बिहारी वाजपेयी के उवाचों के आगे वह पलड़ा हल्का है। भारत देश के तमाम अंग्रेजीदा फिल्मी अदाकारों के समस्त इंटरव्यू मय उनकी हर स्पीच एक पलड़े में रखकर तौल लो, किन्तु दूसरे पलड़े में अकेले हिंदी-वक्ता अमिताभ बच्चन के स्पीच भारी ही पड़ेंगे। यह वे चेहरे हैं जो इन तमाम मिथकों पर रौशनी डालते हैं और इन्हें झुठलाते हैं कि हिंदी कोई दूसरे या तीसरे दर्जे की भाषा हो। ये चेहरे यह साबित करते हैं कि व्यक्तिगत विकास के नाम पे ये किसी विदेशी भाषा पर भरोसा नहीं करते। समाज में असली उच्च दर्जा क्या होता है यह हमें कोई विदेशी भाषा नहीं दिखा सकती।

इतना अवश्य है कि हमें अन्य भाषाओं का ज्ञान भी होना चाहिए। और हिंदी तो हमारी अपनी भाषा है। एक बाहरी भाषा को यदि हम नया समझ कर उसे अपनाने को विकसित हो जाने की ओर बढ़ने का कदम मानने लगे जाएं तो मैं कहूंगा यह हमारी अर्धविकसित सोच का बौनापन और ओछापन है। उड़ता तो पक्षी भी है लेकिन शाम को उसे अपने घोंसले में आना याद होता है। हिंदी ही हमारा घोंसला है हमारा असली घर है। उसके बाद दूसरे, तीसरे, चौथे नम्बर पर हम और जितनी मर्जी भाषाएँ सीखें। तब जाकर जो ज्ञान अर्जित होता है वह है असली व्यक्तिगत विकास। अपनी ही भाषा को दुत्कार कर दूसरी भाषा अपना लेना व्यक्तिगत विकास नहीं व्यक्तिगत ह्रास कहलाता है। इसलिए जब जरूरत हो, समय व उद्देश्य की माँग हो, तभी अंग्रेजी का प्रयोग कीजिए। इसके अलावा जहां तक संभव हो हिंदी का प्रयोग कीजिए। इसे और सीखिए। इसका स्वाद चखिए। इससे प्यार कीजिए। इस पर गर्व करिए। इसके एवज में यह जितना कुछ आपको देगी कोई और भाषा नहीं दे सकेगी।

(आलेख 'गूगल हिंदी इनपुट' एंड्रॉइड एप मय टूल की मदद से हिंदी में लिखा गया है)

Friday, September 8, 2017

अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस

8 सितंबर यानी अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस..

भारत जैसे देश में जहाँ बाबाओं, ज्योतिष-तंत्र-मंत्र-यंत्र और धर्मान्धता की बीमारी जरूरत से कहीं अधिक फैल रखी है, इस दिवस की अहमियत कहीं ज्यादा है। इसे प्रमुखता से विज्ञापित किया जाना चाहिए। हालांकि सरकारें ये काम कभी नहीं करने वाली। यहाँ निरक्षर तो निरक्षर हैं ही है, अधिकांश साक्षर भी केवल डिग्री के साक्षर हैं। कईं बार तो वे निरक्षरों को भी मात देते हैं। एक खास उदाहरण रखूं तो वह होगा वाट्सएप्प का मिस-यूज। मेरे ख्याल से पूरे विश्व में वाट्सएप्प का इस्तेमाल 'अफवाहें फैलाने के मामले में' सबसे ज्यादा हमारे ही देश में होता होगा। और ये काम हमारे साक्षर बुद्धिजीवी पूरे आन-बान-शान से करते हैं। गूगल नाम के औजार का प्रयोग करना तक नहीं सोचते और तुरंत आया हुआ मैसेज आगे सबको ब्रॉडकास्ट! दरअसल ये भी कुछ कुछ टीआरपी वाला खेल ही है। सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज परोसने की कड़ी में वाट्सएप्प के जरिए हम पढ़े-लिखे भी न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज बन बैठे हैं। कहीं हिन्दू धर्म खतरे में हैं, कहीं कोई भगवान इतने खतरे में हैं कि उनके धाम से आया संदेश आगे 10 लोगों को न भेजा तो वे मेरे साथ बहुत ही बुरा करेंगे, कहीं 5 बरस पहले गुम हुआ बच्चा जो आज किसी नौकरी में लगा हुआ है और भारतभर में उसे आज भी व्हाट्सएप्प पे पूरी तन्मयता से ढूंढा जा रहा है, कहीं किसी फिल्मस्टार की फ़िल्म का सिर्फ इसलिए बहिस्कार करना है कि उनका कोई बयान किसी पार्टी या धर्म विशेष के लोगों को बुरा लगा इसलिए अब इसे देशव्यापी मुद्दा बना डालना है, यहीं हिंदुस्तान की सबसे बड़ी समस्या है। बाकी समस्याएँ तो चलती रहेगी।

दूसरी ओर बाबाओं की लीला और उनके अनुयायियों पर तो अब कुछ लिखना शेष रहा ही कहाँ हैं। तीसरी ओर ज्योतिष, तंत्र-मंत्र-यंत्र का इस देश में खास स्थान है और ये सदा रहेगा भी। बेरोजगारी की ऊंची दर, ऊल-जलूल व गैर-जरूरी सांस्कृतिक रीति-रिवाज और गिरता जीवन-स्तर इसे सदा पोषण देने का काम करता रहेगा। इस देश से महान दार्शनिक, लेखक और लीडर निकले हैं किंतु जीवन के कष्टों से तुरंत निजात पाने के लिए बस येन-केन-प्रकारेण जादू-टोना, मंत्र-ज्योतिष कैसा भी सहारा लेकर छुटकारा पाओ। जीवन की पहेली को शायद सम्पूर्ण दुनिया में इन्हीं लोगो ने समझा और सुलझाया है। साक्षर लोगों की तादाद इनमें कोई कम नहीं हैं।

ऐसे अनगिनत उदाहरण 'अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस' की हमारे देश मे अहमियत को दर्शाते हैं। यहाँ विज्ञान होते होए भी जैसे नगण्य है। महान आदर्शों के इस देश में सही मायने में साक्षर लोग बहुत कम हैं। ऐसे लोग विरले ही देखने को मिलते हैं।

इसलिए जरूरत है एक अरसे से रुके देश को आगे बढ़ने में धक्का लगाने की। आँखें मलिए, इन्हें उगते सूरज को देखने दीजिए। हवाओं को पहचानने दीजिए। तमाम चश्मे एक तरफ उतार के रख दीजिए। तमाम कुहरों से अपने मन-मस्तिष्क को आज़ाद कर दीजिए। खतरे में कोई और नहीं, आपकी स्वतंत्र सोच की शक्ति है जो किन्हीं बाहरी शक्तियों के नियंत्रण में हैं। सही मायने में सभ्य बनिए, समझदार बनिए। हर दिशा को देखिए और हर विचार का सम्मान कीजिए। विकसित राष्ट्रों के जन से सीखिए। वे लोग विकसित हैं क्यूंकि वे हमारी तरह ऊल-जलूल समस्याओं में अपने मन की साक्षरता खर्च नहीं करते। अर्थपूर्ण फिल्में देखिए, अर्थपूर्ण पुस्तकें पढ़िए, समाज में चरित्रवान सज्जनों के सान्निध्य में रहिए, विज्ञान में कुछ रुचि रखिए, ब्रेकिंग न्यूज़ से दूरी बनाइए, अपने बच्चों को समय दीजिए, अपने गुरुओं से दोबारा मुलाकात कीजिए, अपने बड़ों से उनके समय की गाथाएँ सुनिए, इतिहास पढ़िए, टीवी से दूरी बनाइए, कभी-कभी संभव हो तो खुद के लिए कुछ लिखिए, पेड़-पौधों या पशु-पक्षियों से रूबरू होइए। आपकी असल दुनिया को सिर्फ ये चीजें खुशनुमा बना सकती हैं। आज के युग में अक्षर के साक्षर तो बनना ही है, बुद्धि के साक्षर भी बनिये। दूसरों के विचार पढ़िए किन्तु अपने स्वतंत्र विचार भी खुद सृजित कीजिए। तब आप भी सही मायने में साक्षरता के पैरोकार होंगे।

Monday, September 4, 2017

पुस्तक समीक्षा : विवेकानंद - जीवन के अनजाने सच

..और मणि शंकर मुखर्जी की 'विवेकानंद: जीवन के अनजाने सच' समाप्त की। अधिकांश जगहों पर किस्सों को समझने में दिक्कतें आती है क्योंकि लेखक ने पूर्ण स्पष्टीकरण नहीं दिया और शब्दों की कमी खलती है। शुरू से अंत तक यह एक लय में भी नही चलती जो बार-बार हमें भी लय से धकेलती रहती हैं। इसके बजाय यह पुस्तक समय रेखा पर कभी पीछे तो कभी बहुत आगे चलते हुए लगातार सक्रियता दिखाती है और हमें खुद ध्यान से तालमेल बिठाना पड़ता है। लेकिन क्यूँकि यह एक कहानी न होकर विभिन्न अनजाने किस्सों का संकलन है, इसलिए इसका ऐसा होना जायज है।

यह छोटा-सा ग्रंथ है जिसमें भीतर समस्त संकलन पाँच अध्याय/शीर्षकों में विभक्त है और जो वाकई नरेन्द्रनाथ (स्वामी विवेकानंद) के जीवन के तमाम अनजाने पहलुओं से रूबरू करवाता है। यह दिखाता है कि वे वाकई कितने सक्रिय थे और उन्होंने क्या-क्या दिन देखे थे। एक ओर जीवन की अंतिम घड़ी तक पारिवारिक मुकदमे जिनमे अच्छे-खासे परिवार की जमा-पूंजी ही खत्म हो चुकी होती है, वहीं दूसरी ओर सन्यास ग्रहण कर निकले बड़े बेटे की अनगिनत बीमारियाँ और गृह-चिंता। एक ओर अधिकांश भाई-बहनों की अकाल मृत्यु तो दूसरी ओर माँ की चिंता में गमगीन मानस के साथ उनका विश्व-पथिक बन विश्व में भारतवर्ष के परचम की पताका फहराना। एक महान सन्यासी के उनतालीस वर्ष, पाँच महीने और चौबीस दिनों की कठिनतम, बेहद मार्मिक और हृदयस्पर्शी यात्रा के विभिन्न पहलुओं का संकलन है यह पुस्तक।

इसे इसलिए पढ़िए कि आप जान सकें कि कौन थे विवेकानंद, कितने कठिन रास्ते पर चले थे विवेकानंद, यह जानने के लिए पढ़िए कि कैसे एक सन्यासी, सन्यास में भी अपनी माँ को नही त्याग पाया और उसने सन्यास को उसकी सही परिभाषा उदाहरण के साथ प्रस्तुत की, उस समय की धार का अनुभव लेने के लिए पढ़िए और पढ़िए तमाम उन बातों को जो विवेकानंद पर लिखी किसी और पुस्तक में विरले ही मिल सके।