Thursday, January 9, 2014

शेर-ओ-शायरी (भाग-2)

वफ़ा का ताबीज़ इस गले में अब भी लटका है,
कुछ अल्फाजों का पुलिंदा हलक में अब भी अटका है।

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अब होली में बचपन वाली शोखी नहीं बची,
परदेसी रंगों ने इसमें अगल़ात घोल दी है।

(शोखी = चंचलता; अगल़ात = अशुद्धियाँ)

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सफ़र-ऐ-मुहब्बत में अब जलजलों से आजमाईश नहीं की जाती,
जिद का वो दौर और था, समझौतों का ये दौर और है।

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ये किसे तुम शेर सुनाते हो मुहब्बतों के 'आनन्द',
बाशिंदे ये 'मौका-परस्ती' की पाठशालाओं से निकले हैं।

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उसूल-आदर्श-इंसानियत के वो किस्से अब हवा हुए,
यही तल्ख़ हकीकत है बच्चे ये 'सिर्फ उम्र से' जवाँ हुए..

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आज भी कुछ चूल्हे नहीं जले, कुछ पेट नहीं पले,
आज भी कही मकान ऊंचे हुए, कही ईमान नीचे हुए।

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सैलाब-ऐ-इश्क में जूनून की कश्ती संभालूं कैसे,
इन मदहोश हवाओं में होश में आऊँ कैसे,
तुम्हारे चाहत के इस समंदर में खोया हुआ,
ऐ जलपरी तुम्हे तलाश के मैं चुराऊं कैसे..

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आज़ाद उड़ती तितलियों सी ये यादें तुम्हारी,
महकते ताज़े गुलाबों सी ये बातें तुम्हारी,
अपनी दुनिया के सभी आईनों से पूछ लेना,
कितनी हसीन होती है ये मुलाकातें तुम्हारी..

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महफ़िलों में जिंदादिली के रंग भरिए,
उदास चेहरों पे आशाओं की उमंग भरिए,
कल तुम्हारा भी सफ़र ख़त्म हो जाएगा,
याद आओ सबको ऐसा 'संग' भरिए

Sunday, October 27, 2013

अभी अभी कुछ जीता हूँ पर...

अभी अभी कुछ जीता हूँ पर
जीतने का सा आभास नहीं होता,
फितरत अभी भी कुछ बाकी है
सुकून का अहसास नहीं होता।

मंदिर जाऊं मैं अगर तो
किसी और के लिए दुआ कर आता हूँ,
जो जाऊं अपने ही घर तो
सवालों का कुआँ बन जाता हूँ।

कभी पूछो मेरी किताबों से
क्यूं आजकल उनसे किनारा किये हूँ,
गहरा नशा सा है घेरे जैसे
कोई पुरानी शराब पीये हूँ।

आखिर ये कौनसी खलिश है
जो मुझमे बाकी रह गयी है,
आखिर ये कौनसी कशिश है
जो मुझे बागी कर गयी है।

ऐ मेरे हमदर्द दोस्तों
अपने हिस्से का फ़र्ज़ अदा कर दो,
मेरी उलझनें सुलझा कर तुम
मुझे फिर से जिंदा कर दो।

..जैसे कोई नया मौसम दस्तक दे रहा है

कंटीली राह पर अब दूब का साम्राज्य है,
संदूक में रखा कंगन अब खनक दे रहा है,
फिजाएं भी अब बदलती सी लगने लगी है,
जैसे कोई नया मौसम दस्तक दे रहा है...

जिस  तन्हाई को अपनी चादर था समझे मैं,
कोई छीन के मुझ से मेरी कसर ले रहा है,
अब तक जो ख़्वाब ख़्वाबों में भी न था,
अभी-अभी आँखों पर अपना असर दे रहा है...

पहुँच ना थी मेरी ऊँची जिस कलि तक,
डाल को उसकी खुद पेड़ लचक दे रहा है,
पहले तो फकत कभी ऐसा न हुआ था,
इक फूल सबसे ज्यादा महक दे रहा है...

मंदिर में कभी अपने लिए कुछ माँगा नहीं,
ईश्वर खुद ही क्यूँ मुझे मन्नत दे रहा है,
मेरी राह उसने कहाँ से कहाँ बना दी,
बिन मांगे क्यूँ मुझे ज़न्नत दे रहा है...

शेर-ओ-शायरी (भाग-1)

पलभर में पनपता पलभर में टूटता है प्यार आजकल,
कृष्ण का-सा प्रेम अब कही देखने को नहीं मिलता.


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जिधर निगाह उठाऊं उधर गुनाहगार नज़र आते हैं,
किसी से इश्क क्या हुआ सबने मुझे गुनाहगार कह दिया.


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यूं ही सिर्फ जताने को जो नज़रें हटा लेती हो तुम,
क्यूँ अपनी नज़रों को नहीं समझाती मुझे ताकना छोड़ दे.


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मोहब्बत के उस मौसम की मुझमे वही चहक आज भी है,
तुम्हारे दिए गुलाब पर तुम्हारे हाथों की महक आज भी है.


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अबके जो मिले मुझसे काला चश्मा पहन कर आना,
मैं जुबाँ पर नहीं आँखों की बातों पर यकीन करता हूँ.


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मुझे तो ये अहसास ही न था तुमसे मिलने से पहले कभी,
के तमाम रंज़-ओ-गम के साथ बारिश में भीगना क्या होता है.


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बरसों पहले की बात है, मेले में देखा था उसे,
उम्र के सात दशक बाद भी वैसा मेला नहीं देखा.


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उसकी मुलाकातें-बातें-यादें सबने खूब संभाला मुझे,
आज बैसाखियाँ कोशिश करती है उसकी जगह लेने की.


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ये जो बरसात का पानी अपनी ही रवानी में है,
इसका एक किस्सा मेरी भी कहानी में है,
इक शख्सियत थी जो अब नहीं है हिस्से में मेरे,
कही न कही अब भी शामिल मेरी जवानी में हैं.

ना जाने कौनसे समाजों की बुनियाद बनाने निकले थे...

ना जाने कौनसे समाजों की बुनियाद बनाने निकले थे,
हम आने वाली किन पीढ़ियों को बसाने निकले थे,
हर इक मकां इस बस्ती में जो मगरूर खुदी में है,
बहुत तैश में है, ना जाने हम कौनसी सदी में है

वो घर फरेब में घायल-जिगर-इंसां का है,
ये घर नतीजा-ऐ-नापाक-किसी-इन्साफ का है,
नुक्कड़ की वो दुकान जो लुटी है बस अभी-अभी,
वो सबूत हमारी नफरतों में मर चुके गिलाफ का है

इस गाँव में मन-भावन मेले छाये रहते थे,
रंगों के वो मौसम बारहमासी आये रहते थे,
ये जो मातम है आज चारों ओर छाया हुआ,
कल तक यहाँ बच्चों के लिए खिलौने बिकते थे

ऐ फितरत-ऐ-इंसां ज़रा ठहर के फिर से सोच,
कल की तरह बीत रही है पहर, बीत रहा है रोज,
तुम्हारी ही कौमें मर-मिट रही है, देख चारों ओर,
क्या देगा अगली पीढ़ी को तू, क्या है तेरी खोज

ये जहां नहीं, इक प्यारा चमन है मालिक का,
तुम्हे ये किसने हक दिया बाकि फूल मिटाने का,
क्या तुम्हारी बगिया के फूल भी रंजीशें खेलते हैं,
क्या वो भी अस्तित्व के द्वंद्व में जख्म झेलते हैं

निकल उस राह पर जो तेरा इन्तज़ार कर रही है,
बदल दे ये कहानी कि अब तेरी घड़ियाँ कम रही है,
त्याग दे वो तालीम जिसमें प्यार के बोल नहीं है,
देख तेरी बगिया भी तुझसे यही सब बोल रही है

क्यूं...

खुली आँखों में ख़्वाब होने तक,
इस काया में जिंदा है इंसान,
यही ख़्वाब तो दौड़ते है सबको,
क्यूं पाना इन्हें है नहीं आसान

नया इक ख़्वाब नई इक चाह,
मन में हरपल नई इक चाह,
कुछ पाने के लिए हैं जी रहे,
क्यूं मिटती नहीं ये 'अबूझ' प्यास

अकेले खुशियाँ खुशियाँ कहाँ,
कुछ दर्द की जीवन में जरुरत भी हो,
पर मर्ज़ ही जब न दर्द का हो,
क्यूं फिर खुदा से नफरत भी हो

यही तो मन के नित-नए रंग है,
यहाँ रात भी है यहाँ दिन भी है,
सारी रात सोये अब चलना है,
क्यूं थम जाने की फिर जिद भी है

मेरी राहों में खूब कांटे है क्योंकि,
खुदा को मुझमे विश्वास गज़ब,
वो चाहे मैं पत्थर से 'हीरा' बनूँ,
क्यूं थक-हार बनूँ मैं 'नास्तिक' अब

जो भूत था वो बीता अभी,
भविष्य अभी तक है बना नहीं,
वर्तमान की कलम उठा कर,
क्यूं न लिखू इक कविता नई

कुर्सी के सौदागर

(केवल गंदे नेताओं पर लिखी एक कविता...
इसलिए आपत्ति केवल वे ही उठाएं जो इस श्रेणी में आते हों...)
पैसों के मजहब से आये हैं ये
इनका दिल कभी नर्म नहीं होता
ये कुर्सी के वो सौदागर है
जिनका कोई देश कोई धर्म नहीं होता

वतन की अस्मत भले ताक़ पे हो
इनके लिए वो अपमान नहीं होता
ये वतन के वो नमकहराम है
जिनका कैसा भी कोई ईमान नहीं होता
ज़हरीली दुनिया के काले नाग है ये
इनका दामन कभी पाक नहीं होता
ये काली किसी दुनिया के वो कलंक है
जिनका नाम-ओ-निशान खाक नहीं होता
हमारी कौम की गन्दी पैदाइश है ये
इनके लिए नरक में भी स्थान नहीं होता
ये जहाँ की हर गाली के वो हकदार है
जिनका श्मशान में भी गान नहीं होता...

उस यार की अब कोई बात न करो..

उस यार की अब कोई बात न करो,
के जिसने दिल ये मेरा तोड़ दिया है,
उन यादों की अब कोई बात न करो,
के मैंने उम्मीदें लगाना छोड़ दिया है

क्यूं करूँ अब बात मैं उजालों की,
जब मैंने रिश्ता अंधेरों से जोड़ लिया है,
उन महफ़िलों की अब कोई बात न करो,
के मैंने सजना-संवरना छोड़ दिया है

अजब ख़्वाबों की गज़ब ये दुनिया है,
हर ख्वाब में मैंने उसका ज़िक्र किया है,
उन ख्वाबों की अब कोई बात न करो,
के मैंने ख्वाब देखना छोड़ दिया है

आँखों के उन पैमानों से पीया बहुत है,
और नज़रें हटाने में दर्द भी लिया है,
उन निगाहों की अब कोई बात न करो,
के मैंने नज़रें उठाना ही छोड़ दिया है

खूब हंसती-गाती थी कभी जिंदगी ये मेरी,
अब इसने रुसवाइयों का नया मोड़ लिया है,
जिंदादिली की कभी हम भी थे मिसाल,
के अब तो मैंने जीना ही छोड़ दिया है