Friday, May 20, 2016

पुस्तक समीक्षा : लोक व्यवहार

डेल कार्नेगी की लोक व्यवहार (Hindi translation of 'How to win friends and influence people) मेरी सबसे खास पसंदीदा पुस्तकों में से एक है। प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला टैग लाईन के साथ यह पुस्तक वाकई सही मायनों में प्रभावी है आपके व्यक्तित्व, आपके नजरिए में एक अलग सकारात्मक और प्रेरक पुट जोड़ने में। अक्सर लोग बड़ी पुस्तकें देखकर ऊब जाते हैं। कई बार भाषा तो कई बार पुस्तक में दिए गए सिंद्धांत बहुत ही उबाऊ होते हैं। यह पुस्तक इन मामलों में भी अलग है। सामान्य से भी छोटे आकर में, एकदम सरल भाषा में, वास्तविक जीवन की घटनाओं के उदाहरणों सहित और शायद ही इसका कोई ऐसा पेज हो जो उबाऊ लगे। अपनी दुनिया और अपने जीवन से बिलकुल हताश कई लोगों ने सिर्फ इसे पढ़कर दुनिया को फिर से गले लगाया है।

व्यक्तित्व विकास, लीडरशिप, सामाजिक और पारिवारिक जीवन में असरदार व्यक्तित्व, हताशा के दौर में उम्मीदों और हौंसलों की पोटली और रोजमर्रा के कामों में लिए जाने वाले निर्णय में व्यावहारिक और विकसित सोच पाने की एक घुट्टी है यह पुस्तक। पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक मानव को अनिवार्य रूप से पढ़ने लायक एक बेहतरीन पुस्तक।

Tuesday, January 12, 2016

ये सर्दियाँ...

यह कविता उस सुंदर लड़की के लिए, जिसकी आँखों में मेरा चेहरा बसता है।
'शालिनी' के लिए...

ये सर्दियाँ भी तुम-सी लगने लगी है,
मेरी साँसों से बातें जो करने लगी है,
रात की खामोशी से निकल के ये धूप,
तुम्हे खोजती हर ओर चलने लगी है

वो सफेद बादल जो छंटने लगा है,
चाहतों में तुम्हारी यों घटने लगा है,
देखी न गयी उससे ठिठुरन तुम्हारी,
महीन कईं टुकड़ों में वो बँटने लगा है

ये जो फूल हैं क्यारियों में खिलते हुए
अपनी ख़ुशबू हवाओं में सिलते हुए
इनको उम्मीदें हैं कि किसी रोज तुम,
गुज़रोगी रूककर इनसे मिलते हुए

वो इक शोख तितली जो उड़ने लगी है
रंगीं दुनिया में तुम्हारी यों जुड़ने लगी है
उसे मालूम न थे मायने ख़ूबसूरती के
तुम्हे देखने को बार-बार मुड़ने लगी है

ये मन तसल्लियों के मौसम का प्यासा
कसमसाहटों के कुहरे-सी ये निराशा
इसे ख़्वाबों की आदत तो न थी मगर
अब हर ख़्वाब में है तुम्हारी ही आशा

Friday, January 8, 2016

क्या संकेत मिला करते हैं..?

इस बात को सालभर से ज्यादा हो गया है, मेरे ऑफिस में मेरा एक साथी था (हालांकि जो अब कहीं और ट्रांसफर है)। वह अपने दो अन्य साथियों के साथ ऐसी ही सर्दी की रात में बोलेरो गाड़ी में कहीं किसी फंक्शन को जा रहा था। घर से निकलने से पहले उसके भाई ने उसे मना किया कि रात हो चुकी है इसलिए कार्यक्रम रद्द कर दें। लेकिन मेरे इस साथी ने उनको ध्यान से जाने की बात कहकर टाल दिया। उसे फिर उसकी भाभी ने मना किया, लेकिन वो क्या करता, आगे सब प्रोग्राम पहले से तय हो चुका था और फिर वैसे भी आजकल हम बाहर के लोगों से की गई बात को घर के लोगों के मुकाबले काफी ज्यादा ही तवज्जो देते हैं, सो भाभी को भी किसी तरह समझा दिया कि ठीक से जाकर सुबह वापिस आ जाऊंगा।

अब बात केवल यहीं तक की नहीं थी। अपनी माँ को भी दिलासा दिया, जिन्होंने उसे रोकना चाहा था। हमारे ऑफिस के ड्राइवर की गाड़ी होने से मैनेजर साहब को गाड़ी की बात बताई गई तो उन्होंने भी पहले मना ही किया। और इस तरह हर तरफ से मिले संकेत नकार दिए गए और ट्रिप स्टार्ट हुई।

वे तीन लोग थे गाड़ी में। सब 18 से 25 की उम्र के। फिर ऐसे में स्पीड की बात क्यों ना हो। गाड़ी तेजी से हाइवे पर दौड़ रही थी। म्यूजिक कैसे ना बजता। तीन दिमाग साथ हो तो कोई भी गाना तीनों को कैसे पसंद आता। एक अँधेरे-भरे मोड़ पर जब गाड़ी हवा से बातें कर रही थी, उनमे से एक, ड्राइवर-साथी ने म्यूजिक सिस्टम पर गौर करते हुए कुछ स्विच घुमाने को जैसे ही थोड़ा झुका और स्विच छेड़ते हुए अचानक सामने सड़क का घुमाव पाया, इससे पहले की ब्रेक लग पाते, 4-wheeler Bolero गाड़ी सड़क से हवा में लहराती जब कच्ची रेतीली, जमीन पर उतरती है तो खुद उनमें से किसी को नहीं पता चलता कि इसके बाद गाड़ी ने कितने पलटे खाये थे। कितने पेड़ और झाड़ियाँ उनको रोकने की कोशिश में रौंदे गए! सबसे ज्यादा घायल मेरा ऑफिस वाला साथी ही हुआ था क्योंकि वो गाड़ी में से उछलकर बाहर जा गिरा और कोई पत्थर से सर जा लगा। उसका एक साथी जो उठ-चल पाया, उसने आते-जाते वाहनों में से किसी की मदद से हॉस्पिटल की राह दिलवाई। मेरे साथी को गंभीर चोट लगी थी। कुछ दिन कोमा का दौर चला। होश में आने पर उसे सबसे पहले वो सब लोग याद आने लगे जिन्होंने उसे उस रात बाहर जाने से मना किया था। लेकिन इनमें से भी सबसे पहले... माँ... इससे पहले उसे कभी इस तरह नहीं रोका गया था। तो...? तो क्या, संकेत मिला करते हैं..?

खैर वो उसका एक कल था, जिससे उसने सबक लिया। उसकी शख्सियत अब पहले जैसी नहीं है। इससे पहले कि हम उसे बुरा समझने की जल्दबाजी करें, जरा सोचिये, आप और हम भी अक्सर ऐसे संकेत नज़रअंदाज़ करते आए हैं। हम भी अक्सर जीवन के छोटे दिखने वाले अहम निर्णय बिना सबसे या बिना घरवालों से बतियाये तुरंत और खुद ही कर लेते हैं। कभी-कभी तो बस एक फोनकॉल-भर की जरुरत होती है। और तो और तमाम संकेत मिलने के बाद भी अक्सर हम अपने ख़्वाब की ओर दौड़ पड़ते हैं। अक्षय कुमार की आने वाली फ़िल्म 'एयरलिफ्ट' में एक डायलॉग सुनने को मिलेगा जिसमे अक्षय कहते हैं, "आदमी की फितरत ही ऐसी है.. चोट लगती है ना, तब आदमी माँ-माँ चिल्लाता है।"

ज़रा ठहर के सोचिएगा, यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति से गुजर रहे हैं, तो क्या आपको कोई संकेत मिल रहे हैं या चोट खाने के बाद माँ याद आएगी?

Saturday, December 26, 2015

दुनिया मोबाईल फोन्स की..

एक तो ये मोबाइल फोन्स की दुनिया भी दिलचस्प होने के साथ-साथ बड़ी उलझन भरी है। यहाँ हर रोज नए फोन्स आ जाते हैं। एक ही मॉडल के अगले नए-नए वर्ज़न आ जाते हैं, जो पिछले वर्ज़न को कमतर बना देते हैं। विकल्प इतने हैं कि खरीदने जाओ तो दिमाग का दही हो जाए और चकरघिन्नी होकर भी तय ना करता बने कि आखिर कौनसा लिया जाए?

सबसे पहले तो साधारण बटन फोन्स, फिर उससे आगे QWERTY Key Pad के नाम पर एक अलग श्रृंखला और फिर हद से भी आगे ये स्मार्टफोन्स की असीमित दुनिया। ऊपर से साधारण नामी-गिरामी, फिर चाइनीज़ कंपनियां और फिर बड़े ब्रांड्स के रूप में और ज्यादा उलझन। इसके बाद भी आप चाहे जो भी जैसा भी फोन ले लें, आपको अनेक ऐसे साथी मिलेंगे जो आपके फोन में नुक्स निकालेंगे ही निकालेंगे और कोई अन्य फोन जो उनके हिसाब से बेस्ट है, लेना चाहिए था कहकर दुःखी कर ही देंगे।

अब इस दुनिया की दूसरी तस्वीर भी बड़े कमाल की है। मुझे याद है बचपन में जब BSNL के उस Landline टेलीफोन, जिसे लगाने पर पूरी गली में मिठाई बांटी थी, की घंटी सुनने को कान खड़े रहते थे और बजते ही हर कोई अटैंड करने को तुरन्त उसकी ओर लपक पड़ता था। और वहीँ आज महंगे से महंगे मोबाईल फोन रखने वाले को भी कॉल करो तो सामने से फोन अटैंड नहीं किया जाता। 

खैर! अपनी-अपनी तसल्ली के हिसाब से अपना-अपना फोन खोजते रहिए। नए फोन के ख़्वाब देखिए। तसल्ली से बड़ी क्या चीज़ है। खरीदते रहिए।

Saturday, December 12, 2015

छोटी-सी बात.. (भाग-2)

एहसास ज़ख़्मी है हर एक आस ज़ख़्मी है..
सज़ा-ए-मुहब्बत में मन का लिबास ज़ख़्मी है...

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रात खामोश है.. साकी मदहोश है..
उनके होंठो की छुअन, पैमाने बेहोश हैं...

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दिखावे की दुनिया में सब दिखावे पे हैं फ़िदा
'प्रेम' की चिरैया किस्सों-कहानियों की बात हैं..

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सब अपने-अपने सलीके हैं, सब अपना-अपना शौक,
'खुलापन' किसी की आज़ादी, किसी की खुद को 'रोक'

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दरवाजों की दुनिया है ये, 'मन' तक यहाँ कैदी हैं।
बाहर वालों की बात छोड़ो, यहाँ घर के 'लंकाभेदी' हैं।

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आइनों को भी जिस से मोहब्बत हो
कायनात की विरासत, मेरी हूर हो तुम..

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ना अब वो वज़ीर रहे, ना अब वो प्यादे रहे
नेताओं के जो पूरे भी हो, ना अब वो वायदे रहे

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उसने आज़ादी और ख़्वाब के लिए सबसे मुँह मोड़ा,
माँ-बाप जिसके परवरिश में फुरसत तक ना निकाल पाए

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सब दास्तानें हैं इस दौर में अपनी-अपनी 'आजादियों' की,
माँ तक को नहीं बख्शा जाता ख्वाब के आड़े आने में

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टूटते रिश्ते, मौकापरस्ती और लालची ये दौर
बचपन बीता, जवानी बीती, आया है ये ठौर

Saturday, November 14, 2015

छोटी-सी बात..

अब कहाँ वो राहतें, वो चैन खेल-कूद की होड़ में
हम भी शरीक हुए अब, रोटी कमाने की दौड़ में...

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हर चीज़ की कुछ तो कीमत चुकानी ही पड़ती है,
मुफ़्त में तो सिर्फ माँ का प्यार नसीब हो सकता है...

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सब फरेब हैं 'मन' के,
सब खेल हैं 'तन' के..

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आईना पूछता रहा कौन हो तुम
आँखें जानती थी जवाब, खामोश रही..

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दिन के शोर-शराबे से रात की चुप्पी अच्छी,
चेहरे तमाम झूठे और मन की हर बात सच्ची..

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दुश्मनी की होड़ में नित खंजर बदल जाते हैं,
कौमें मर-मिट जाती है, मंज़र बदल जाते हैं,

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इंसान हो के इंसान की जान ले,
इंसान वो असल में इंसान नहीं..

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रातें भी बड़ी विचित्र होती हैं,
नित कितने 'राज़' लिखती है यें..

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फैला इनका गज़ब व्यापार है,
चैनल आज सौ से भी पार है,
फूहड़ हर ज्ञान और मल्हार है,
ना वो 'सुरभि' ना 'चित्रहार' है

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कुछ यूं भी हमें रास ना आई
रिश्वत करारे नोटों की,
वो गाँधी भी क्या सोचेगा
'प्यास' देख के मेरे होटों की..

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स्वर-व्यंजन से बना अक्षर, अक्षरों से शब्द
शब्दों से बने वाक्य और फिर पूरी एक कहानी।
कहानी मैं हूँ, स्वर-व्यंजन तुम।

Thursday, October 15, 2015

वो 'विचार' कहाँ गया..?

देश की तरक्की के सिलसिले में सबका हाल देखो..
कोई राहुल गांधी को लेकर पागल है। कोई नरेंद्र मोदी को लेकर पागल है। कोई अरविन्द केजरीवाल को लेकर पागल है।

अब दौर वो रहा ही नहीं कि उस 'विचार' विशेष को लेकर पागल हुआ जाए जो असल में देश को तरक्की देने के लिए पैदा हुआ था। वो विचार कहीँ बहुत पीछे छूट चूका। अपने-अपने नेता के फैन लोग कहते हैं कि उन्हें अपने नेता पर पूरा भरोसा है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक भेड़ों का झुंड उस एक गड़रिये के पीछे-पीछे चलता जाता है जो जहाँ चाहे उन्हें ले जाए। सबको भेड़ बनने में बड़ा आनन्द आ रहा है। इस तरह उनके अनुसार गड़रिया सदैव सही है।

जिस हरी घास की तलाश का उन्हें कभी 'विचार' आया था वो विचार अब गौण हो चुका है। उन्हें तो हर रूखी-सूखी घास मंजूर है, क्योंकि कुछ ही समय में थोड़ी ना कोई घास के मैदान ऊग जाते हैं। घास के मैदान ऊगने में वर्ष लगते हैं। गड़रिया कोशिश कर तो रहा है। होते होते होगा।

ज़रा कभी किसी पेड़ की छाँव तले इत्मीनान से वक़्त मिले तो सोचियेगा.. वो विचार कहाँ गया और ये गड़रिया कहाँ ले जा रहा है?

Sunday, July 5, 2015

अभी कल की ही तो बात है…

अभी कल की ही तो बात है…
ये घर कच्चा था, रिश्ते पक्के थे,
सबसे मेलजोल था, हौसले जगे थे,
रातों को सन्नाटे नहीं, होते रतजगे थे,
हमारे पैर नहीं, ये रास्ते थके थे

अभी कल की ही तो बात है…
अच्छे अंकों से, कुछ बड़ा बनना था,
पापा की गाड़ी, चलाना इक सपना था,
उम्मीदों के मौसम में, दिन-रात तपना था,
ये ज़मीं अपनी थी, ये आसमाँ अपना था

अभी कल की ही तो बात है...
नानी की हर कहानी में इक नयापन था,
दादी की घुड़की में भी अपनापन था,
गुल्ली-डंडे और कंचे का बचपन था,
अलहदा-सा, नया-सा, वो लड़कपन था

अभी कल की ही तो बात है...
मास्टरजी की कक्षा में पढ़े ही थे,
गणित-अंग्रेजी में हम अड़े ही थे,
बच्चों के लिए बड़े, सदा बड़े ही थे,
घर के हर जरूरी नियम, कड़े ही थे,

अभी कल की ही तो बात है...
हमारे दोस्त कम थे, पर जो थे अच्छे थे,
घर आए मेहमान, मन से सब सच्चे थे,
हम शरारत में अव्वल, पेशगी में कच्चे थे,
बड़े बनने को आतुर, लेकिन हम बच्चे थे

अभी कल की ही तो बात है...