Wednesday, April 26, 2017

टीवी : एक आवारा-सा गरीब

आज की तारीख में टीवी देखो तो सैकड़ों चैनल्स और हजारों प्रोग्राम्स मिल जाएंगे। लगभग हर वाहियात विषय तक पर चैनल्स और प्रोग्राम्स है।

इतनी भीड़ में भी एक दूरदर्शन के शो 'किताबनामा' को छोड़ दो तो 'पुस्तकों' पर कहीं भी एक प्रोग्राम तक नहीं मिलता। सच तो यह है कि टीवी अब लगता ही नहीं कि ज्ञान का साधन रहा हो, यह एक आवारा-सा 'गरीब' जान पड़ता है जिसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

'नई सड़क' ब्लॉग के लेखक और एनडीटीवी के न्यूज़ एंकर, रविश कुमार अक्सर सच ही कहते हैं, "टीवी कम देखिए।" इस विषय में मेरी ही लिखी चंद पंक्तियाँ याद आती है..

फैला इनका गज़ब व्यापार है,
चैनल आज सौ से भी पार है,
फूहड़ हर ज्ञान और मल्हार है,
ना वो 'सुरभि' ना 'चित्रहार' है..

Saturday, March 18, 2017

छोटी-सी बात.. (भाग-4)

वक़्त की चोटों से छिले ख़्वाब,
हम पुरानी यादों में जीते नवाब..

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कुछ शब्द.. इतने नुकीले होते हैं कि
आने वाली नस्लें भी दर्द ढो रही होती हैं..

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कभी-कभी शब्दों को पोटली में बांधकर रखिए,
बात जो नाज़ुक-सी कहनी हो आँखों ही से कहिए..

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जो ख़्वाब था वो कभी टूट चुका
जो भ्रम था वो अभी रूठ चूका
इक अरमाँ था बाकी कहीं सीने में
अबकी सैलाब में वो भी छूट चुका

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आस्तीनों के सांप.. पाल रखे हैं हम सबने,
और फिर कहते हैं.. हमें दुःख दिया है रब ने..

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किरदार की फ़िकर में सीरत थी संवारनी,
दिल चंचल बुलबुला, कर बैठा आवारगी..

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इक मेरा आईना है जो अपने ही भ्रम पालता है,
इक तेरा चेहरा है जो मुझे हर रोज संवारता है..

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जवानी से थोड़ा आगे चलकर, दो मोड़ थे मुड़ते हुए,
इक चकाचौन्ध-सा, कहीं दूर जाता हुआ,
इक शाँत-सा, कच्चा-सा..
माँ के आँगन की ओर सरकता हुआ..

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कुछ ख़्वाबों का अधूरा रहना भी जरूरी है,
ज़िन्दगी में सब मुकम्मल मिले तो जीना क्या..

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शहनाई बेज़ान सी पड़ी है आज इक कोने में,
संगीत के सब 'सुर' अब 'डिजिटल' हो गए हैं..

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मंदिर की दहलीजों ने भी महसूस किया है,
उदास आँखों के भीतर भी इक दुनिया है..

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खुशियों ने हमेशा एक दूरी से देखा मुझे,
ये तो ग़म थे जिन्होंने सदा अपनाया मुझे..

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पाने को बहुत कुछ न पा सके तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
दिल को मगर अब तक जवाँ रखे है क्या ये कम है..

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रंग होली का तो फिर भी उतर जाएगा,
रंग गर मेरा उतरे तुम पर से तो बताना..

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ये कोई मन्नत न थी कि तुमको पा लूँ किसी रोज,
ये उस मंदिर की दहलीज-ओ-दीवारों की ज़िद थी..

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होलियाँ तो कईं आई और गई,
अबकी बार जो चढ़ा है ये रंग न उतरेगा
रहगुजर तो कईं आए और गए,
दिल में लेकिन तुमसा कभी न ठहरेगा..

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कभी-कभी दर्द खुद भी इक दवा-सा लगता है,
टूटा हुआ वो बूढ़ा ख़्वाब भी जवाँ-सा लगता है..

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काँच के बना रखे हैं मन यहाँ हमने,
इक जरा-सी बाहरी खनक और सब चूर..

Wednesday, February 22, 2017

इक शाम ऐसी हो..

इक शाम ऐसी हो,

तुम हो, मैं होऊं, और कोई न हो
नई चाहतें हो, कईं राहतें हो, कोई आहतें न हो,
खुला आकाश हो, प्रेम-विन्यास हो, कोई कयास न हो,
हाथ में हाथ हो, इक-दूजे का साथ हो, कोई बात न हो,
मचलते अरमाँ हो, बरसता समाँ हो, कोई तूफ़ाँ न हो,

इक शाम ऐसी हो..
करवटें हों, सिलवटें हों, कोई आहटें न हो
ज़िन्दगी हो, दिलकशी हो, कोई गमनशीं न हो
दीवानगी हों, तिश्नगी हो, कोई दिलठगी न हो
पूरी मन्नतें हों, नई जन्नतें हों, कोई जिल्लतें न हो
हाँ बस तुम हो, मैं होऊं और कोई न हों..

इक शाम ऐसी हो...

Monday, November 14, 2016

आखिर कौन हूँ मैं..?

इस नश्वर शरीर में यह, आखिर कौन हूँ मैं..?

कुछ अधूरी जिज्ञासाओं का बैरंग-सा कैनवास हूँ मैं
अपने अधूरे रहे सपनों से आगे बढ़ा 'आज' हूँ मैं
पिता के आगे बचपन की वो दबी-सी आवाज हूँ मैं
सबसे शैतान होकर भी अपनी माँ का नाज़ हूँ मैं

अपनी नाकामियों में छिपी इक दबी-सी आस हूँ मैं
अभी तक जो पहना न गया वो नया लिबास हूँ मैं
हाँ कुछ लोगों के लिए उनके गले की फाँस हूँ मैं
बावजूद इसके लेकिन खुदी में बहुत खास हूँ मैं

जो रहा सदा ही उम्मीदी के गुल में गुलशन
संकुचित-सा ठहरा-सा वो इक 'भ्रमर' हूँ मैं
अपने ही अजाबों में ग़मगीन आगे बढ़ता
निर्बाध-सा अविरल-सा वो इक 'भँवर' हूँ मैं

पीछे छूट चुके लम्हों में जीता आया पल हूँ मैं
जिसका अभी आना है बाकी वो नया कल हूँ मैं
कुछ अपनों के छलावों में छला गया छल हूँ मैं
किन्तु फिर भी शान्त झील का नया जल हूँ मैं

दौड़ती-भागती जिंदगी में जैसे गौण हूँ मैं
चीखती आवाजों के शोर में भी मौन हूँ मैं
फिर भी अक्सर यह सोचता रहता हूँ
इस नश्वर शरीर में यह, आखिर कौन हूँ मैं..?

Thursday, November 10, 2016

एक बार बचपन में..

एक बार बचपन में (अंदाजन मैं तब शायद चौथी कक्षा में था) स्कूल की छुट्टी वाले दिन चाचा की दूकान पे सारा दिन बिताने के बाद शाम को जब उनके साथ घर लौट रहा था, तब बहुत तेज आंधी चल रही थी। चाचा के दिमाग की खुराफात के अनुसार मैं पड़ोस के घर के दरवाजे (जहाँ इतनी जगह थी की मुझ जितना बच्चा अंदर धंस कर छुप सके) में खड़ा हो कर कुछ देर अंधड़ के दौरान छुपा रहा।

चाचा अंदर गए तो दादी ने पूछा Anand कहाँ हैं?
वो बोले "क्या? मुझे क्या पता, तुमको पता होना चाहिए।"
अब दादी अचानक से बहुत गंभीर हो गई और बोली "अरे लेकिन वो तो तुम्हारे साथ गया हुआ था ना सुबह से?"
चाचा अब अदाकारी करते हुए गंभीर होकर बोले- "हाँ लेकिन मैंने तो उसकी जिद करने पर दोपहर में घर जाने दिया था, आया नहीं था क्या?"

दादी तुरंत वार्ता काट उठकर भागते हुए बाहर आई और उड़ती मिट्टी में नहाई धुंधली गली में अपनी धुंधली-सी पथराई आँखों से जितना दूर देख सकती थी देखा। पर वहाँ मैं नहीं दिख पाया। उस दरवाजे में खड़े उस वक़्त मुझे कुछ बुरा भी लग रहा था, क्योंकि दादी दुःखी हो गई थी। अपने दुःखी पल में मैं उनके ही पास दौड़ा जाता था और उनके लाड़-पुचकार का असर भी जरूर होता था। सो यहीं सब सोचकर मैं दरवाजे में से निकला और अपने घर में दाखिल हुआ। दादी चाचा से बहुत गुस्से में जानकारी ले रही थी कि "मेरा छोरा कब कितने बजे वहाँ से घर को रवाना हुआ, तुमने उसे ऐसे कैसे भेज दिया, घर कितना दूर है, अब क्या किया जाए, जल्दी से कुछ करो, तुम यहाँ खड़े हो अभी तक!!!"

और तभी पलटकर उन्होंने मुझे देखा तो वे सारा माजरा समझ गए। हालांकि फिर भी वे तुरंत सबसे पहले मेरी और लपके और मुझे सीने से लगाया। बाद में उन्होंने चाचा को जो सुनाया वो बताने लायक नहीं।

खैर, आज जब भी कभी किसी बच्चे को अपने दादा-दादी को इग्नोर करते या उनपे गुस्सा होते देखता हूँ तो मुझे अपना ये बरसों पुराना किस्सा याद आता है। ऐसा नहीं है कि मेरी दादी मुझपे गुस्सा नहीं होती थी, बहुत गुस्सा होती थी। लेकिन परवाह किये जाने की जो यह सीमा है, वो हर बात से कही अधिक मायने रखती है। हम इंसान दूसरी ओर इस सकारात्मक बात को दरकिनार कर गंभीर सिर्फ इस बात पे ही होते हैं कि हमारे बड़े हम पर गुस्सा हुए तो आखिर हुए क्यों और ये ही एक नकारात्मक विचार अपनी आँखों के सामने चिपकाये फिरते रहते हैं। अपने दादा-दादी, नाना-नानी के इस सकारात्मक पहलू को एक बार महसूस करने की कोशिश कीजिए। पढ़ने के लिए शुक्रिया।

Tuesday, September 27, 2016

छोटी-सी बात... (भाग-3)

कुछ यूं हुआ की आईना सामने था,
हम उसमें खुद को तलाशते रह गए
जिन आँखों को रुलाया था हमने,
उन आँखों में 'वो' हमें तराशते रह गए

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मैंने रास्तों से कहा है पलकें बिछाये रहना
वो जो आएगा किसी सावन से कम नहीं...

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मैं इत्मिनान के लम्हों का इक कोयला,
तुम आगाज़ के हौसलों की दहक मेरी...

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चार दीवारें खड़ी कर देने से आशियाना नहीं बनता
त्याग और हौंसलों से घर को 'घर' बनाना पड़ता है..

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(राजस्थानी भाषा में)
म्हैं जद भी बिण बरगद ने देखूँ हूँ,
लागे है एक जुग खर्च कर'र बाबूजी खड़या है।

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अश्क़ आँखों में दबाया हुआ था,
तल्ख़ी हलक में बांधे हुए थी,
दिमाग की सुनते तो गरजते हम भी,
हमने दिल की नब्ज थामे हुए थी

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कागज़ की खुशबू और स्याही की गहराई न महसूस की
तो फिर आप ज़िन्दगी का स्वाद नहीं जानते।

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कहानी तो रोज ही लिखता है मेरा किरदार,
तुम आ जाओ तो इक कविता मुकम्मल हो..

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तनाव का अर्थ क्या होता है, समय का महत्त्व क्या होता है..
एक सरकारी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में पूछिए..

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कभी-कभी खुदा से लग के गले
जी-भर रोने का मन करता है..

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कभी-कभी मन भी चिल्लाना चाहता है।
कभी-कभी आँखें भी चीखना चाहती है।

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कभी-कभी असली सुकून,
दर्द के बाद ही मिलता है..

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वक़्त के साथ बदलना तो है लाज़िम लेकिन,
जितना तुम बदले हो, इतना नहीं बदला जाता..

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मंजिलें तो किसी रोज हासिल हो ही जाएगी,
क्यूँ ना तब तक लुत्फ़ रास्तों का उठाया जाए..

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इक कायनात मेरे चारों ओर है
इक कायनात तेरी आँखों में है,
बोलो किसके तिलिस्म में जाऊं..

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'प्यास' क्या होती है मेरे होठों से पूछो,
'तृप्ति' क्या होती है तुम्हारे होठों से पूछो..

Friday, May 20, 2016

पुस्तक समीक्षा : लोक व्यवहार

डेल कार्नेगी की लोक व्यवहार (Hindi translation of 'How to win friends and influence people) मेरी सबसे खास पसंदीदा पुस्तकों में से एक है। प्रभावशाली व्यक्तित्व की कला टैग लाईन के साथ यह पुस्तक वाकई सही मायनों में प्रभावी है आपके व्यक्तित्व, आपके नजरिए में एक अलग सकारात्मक और प्रेरक पुट जोड़ने में। अक्सर लोग बड़ी पुस्तकें देखकर ऊब जाते हैं। कई बार भाषा तो कई बार पुस्तक में दिए गए सिंद्धांत बहुत ही उबाऊ होते हैं। यह पुस्तक इन मामलों में भी अलग है। सामान्य से भी छोटे आकर में, एकदम सरल भाषा में, वास्तविक जीवन की घटनाओं के उदाहरणों सहित और शायद ही इसका कोई ऐसा पेज हो जो उबाऊ लगे। अपनी दुनिया और अपने जीवन से बिलकुल हताश कई लोगों ने सिर्फ इसे पढ़कर दुनिया को फिर से गले लगाया है।

व्यक्तित्व विकास, लीडरशिप, सामाजिक और पारिवारिक जीवन में असरदार व्यक्तित्व, हताशा के दौर में उम्मीदों और हौंसलों की पोटली और रोजमर्रा के कामों में लिए जाने वाले निर्णय में व्यावहारिक और विकसित सोच पाने की एक घुट्टी है यह पुस्तक। पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक मानव को अनिवार्य रूप से पढ़ने लायक एक बेहतरीन पुस्तक।

Tuesday, January 12, 2016

ये सर्दियाँ...

यह कविता उस सुंदर लड़की के लिए, जिसकी आँखों में मेरा चेहरा बसता है।
'शालिनी' के लिए...

ये सर्दियाँ भी तुम-सी लगने लगी है,
मेरी साँसों से बातें जो करने लगी है,
रात की खामोशी से निकल के ये धूप,
तुम्हे खोजती हर ओर चलने लगी है

वो सफेद बादल जो छंटने लगा है,
चाहतों में तुम्हारी यों घटने लगा है,
देखी न गयी उससे ठिठुरन तुम्हारी,
महीन कईं टुकड़ों में वो बँटने लगा है

ये जो फूल हैं क्यारियों में खिलते हुए
अपनी ख़ुशबू हवाओं में सिलते हुए
इनको उम्मीदें हैं कि किसी रोज तुम,
गुज़रोगी रूककर इनसे मिलते हुए

वो इक शोख तितली जो उड़ने लगी है
रंगीं दुनिया में तुम्हारी यों जुड़ने लगी है
उसे मालूम न थे मायने ख़ूबसूरती के
तुम्हे देखने को बार-बार मुड़ने लगी है

ये मन तसल्लियों के मौसम का प्यासा
कसमसाहटों के कुहरे-सी ये निराशा
इसे ख़्वाबों की आदत तो न थी मगर
अब हर ख़्वाब में है तुम्हारी ही आशा