Tuesday, July 25, 2017

चले थे जो...

चले थे जो निकल के
घर से कॉलेज की ओर,
क्या सुहाना सफर था
थी क्या सुहानी भोर..

अरमानों की गठरियाँ
और मन की कच्ची डोर,
आज़ादी का मौसम
और रॉक संगीत का शोर..

सिलेबस के काले बदरा
और दोस्तों का मौसम,
रातों के हम जुगनू
जग लगता हमसे रौशन..

जब निकले कॉलेज से
तो सिर्फ डिग्री थी पास,
न मिला सुहाना सफर
न आई भोर कोई रास..

एक-एक कर खो गई
गठरियाँ सब अरमानों की,
बेड़ियों में जकड़ गयी
आज़ादी हम दीवानों की..

धज्जियाँ उड़ चुकी थी
रॉक संगीत की ऐसे,
सुरूर घुटनों पे आ
हो जाए तिश्नगी जैसे..

ज़िन्दगी खुद अब
रोज का सिलेबस हो गई,
दोस्ती की किताब
पिछले बरस का कोर्स हो गई..

जुगनुओं वाली रातें
हसीं कल का ख्वाब हो गई,
जग तो खुद है रौशन
हमारी रौशनी कही खो गई..

जीवन की कठोरता का
तब पहला अहसास हुआ,
बनावटी दुनिया का
असल एग्ज़ाम तब पास हुआ..

इक ऐसा दौर था वो
जूझते-हारते चलते रहे,
रुकते-गिरते तो कभी थमते
और खाली हाथ मलते रहे

किन्तु अपनी धुन के
हम भी जिद्दी शेर थे
हालात चाहे कठिन रहे
हम लेकिन दिलेर थे

मुसीबतों को अपना मान
एक-एक कर झेलते रहे,
आखिर हैं तो ये अपने ही
इसलिए दुःखों से खेलते रहे

उगते सूरज के साथ
मन के सब ख्वाब जोड़े
ढलती सांझ के साथ
जड़ सब दुःस्वप्न तोड़े

और फिर इक दिन
सफलता की कोंपलें फूटी
महक उठी मन की गलियाँ
बेबसी की बस्ती छूटी

इतना सब हो गुजरा
तब जाकर यह ज्ञान हुआ
मेहनत और जुनून की
ताकत का ध्यान हुआ

बेड़ियाँ भी हम ही हैं
और हम ही सुहानी भोर
कच्ची डोर भी हम ही हैं
हम ही आज़ादी का शोर

Monday, July 10, 2017

क्रिकेट और मिट्टी का घरौंदा..

सरकारी स्कूल की वो सातवीं कक्षा थी। खेल का मतलब सिर्फ क्रिकेट होता था। जब आप राजस्थान में जोधपुर जिले के फलौदी तहसील से नाता रखते हैं तो खेजड़ी वृक्ष आपके लिए एकदम सामान्य वृक्ष है। क्रिकेट हमने उसी खेजड़ी वृक्ष की मोटी-सी डाल से बैट निकाल कर खेला है। यह बेसबॉल के बैट की तरह दिखता था। शॉट किसी भी दिशा में जा सकता था। हालांकि हमने मार्केट से मिलने वाले बल्ले से भी खेला है लेकिन जॉन्टी रॉड्स, शोएब अख्तर, अनिल कुंबले और नयन मोंगिया के किरदारों का भी खासा असर रहा कि बल्लेबाजी से ज्यादा ध्यान और हिस्सों पे भी रहा। ऐसे में बल्ला कैसा भी हो क्या फर्क पड़ता। उस वक़्त मैदान में लगता था क्या मस्त ज़िन्दगी है। हमने तो ये तक डिस्कस किया था कि अमेरिकन्स कितने बदनसीब है बेचारे, वेस्ट इंडीज को छोड़ दो तो बाकियों को बेसबॉल और रग्बी से काम चलाना पड़ता है। क्रिकेट उनके नसीब में ही नहीं। क्रिकेट का वो खुमार ऐसा था कि कभी सोचा तक नहीं कि गर ये खुमार किसी दिन उतर गया तो?

समय बीता। मैच फिक्सिंग के दौर में हैंसी क्रोन्ये, निकी बोये, अजहरुद्दीन, अजय जडेजा और हर्शल गिब्स का नाम उछला। बाकी बरी हुए और क्रोन्ये ने अपना जुर्म स्वीकार किया। उस वक़्त लगा जैसे किसी ने मिट्टी में बनाया हमारा सबसे सुंदर घरौंदा तोड़ दिया हो। हमने ये घरौंदा फिर से बनाना-सजाना शुरू किया। सौरव गांगुली की अगुवाई में हमने भारतीय टीम को विदेशी जमीन पर पहली बार आक्रामक तेवर से खेलते और अंग्रेजों को उनकी भाषा मे जवाबी गालियाँ देते और जीतते देखा। पूरी तरह से बिखरी हुई टीम को विश्व कप 2007 के लिए फिर से तैयार होते देख ही रहे थे कि 2005 में ऑस्ट्रेलिया से आए कोच ग्रेग चैपल ने अगले 2 बरस भारतीय टीम की बखिया ही उधेड़ कर रख दी। गांगुली सहित पुराने खिलाड़ी जैसे उनके लिए किरकिरी थे। यह चैप्टर इतना लंबा खिंचा था कि क्रिकेट का खुमार लगभग उत्तर ही चुका था। भारत और पाकिस्तान तो सुपर-8 में भी जगह नहीं बना सके। उधर हार के ठीक अगले दिन पाकिस्तानी कोच बॉब वूल्मर अपने होटल के कमरे में मृत पाए गए। इस बार तो जैसे घरौंदा पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुका था।

आखिरकार चैपल को पूरे भारतवर्ष से गालियाँ पड़नी शुरू हुई। बीसीसीआई का सपोर्ट भी खत्म हुआ। कोई रास्ता न मिला तो वे पतली गली से निकल लिए। इसके बाद आए दक्षिण अफ्रीकी कोच- गैरी कर्स्टन। टीम ऐसे उभरी जैसे अब अगले विश्व कप में हमें कोई नहीं हरा सकता। और सचिन के अधूरे सपने को पूरा होते देखा.. 2011 का विश्व कप हमने जीत लिया। कप्तान गांगुली नहीं थे। कप्तान थे महेंद्र सिंह धोनी। मगर हमारे दिलों की धड़कन तो गाँगुली ही थे। लड़ना और अंग्रेजों को गरजकर दिखाना उन्होंने ही शुरू किया था। ये गाँगुली ही तो थे जिन्होंने सहवाग को लेकर पाकिस्तान को पाकिस्तान में हराया था। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया को ऑस्ट्रेलिया में हराया और इंग्लैंड को इंग्लैंड में धूल चटाकर एंड्रयू फ्लिंटॉफ की सरजमीं पर उसके खुद से ज्यादा आक्रामकता से वो टी-शर्ट निकाल कर लॉर्ड्स के स्टेडियम में फहराई थी। वह खुमार तो सिर्फ 90 के दशक के क्रिकेट फैन ही समझ सकते हैं। उस वक़्त रगों में खून नहीं, फिर से क्रिकेट दौड़ता था। हमने इस बार अब तक का सबसे बड़ा घरौंदा बनाया, लेकिन तभी..

2008 में खबर आई कि गाँगुली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास ले रहे हैं। ये वो दौर था जब दो तरह के दर्शक हुआ करते थे। एक वे पुराने जिन्होंने क्रीज से दो कदम बाहर आकर लॉंग ऑफ और लॉंग ऑन के बीच गेंदबाज़ की टोपी के ऊपर से सिक्सर लगाने वाले के पर्याय के रूप में सचिन तेंदुलकर को देखा था, तो वहीं दूसरे वे जिन्होंने हेलीकॉप्टर शॉट के बेताज बादशाह एम.एस. धोनी की फुर्ती देखी थी। हम वो पुराने टाईप वाले दर्शक थे जिनका अब समय उसी तरह खत्म हो रहा था जिस तरह हमारे हीरोज का। थोड़े समय बाद सचिन, सहवाग, कुंबले, द्रविड़ भी इस मैदान से बाहर आ गए। सहवाग को तो अलविदा तक करने का मौका नहीं दिया गया। हमें लगा जैसे अब क्रिकेट में कुछ नहीं बचा, यह नए दर्शकों के लिए है।

बाद में आईपीएल के मकड़जाल ने इसे और ज्यादा फेमस भी कर दिया और बदनाम भी। हरभजन-श्रीशांत विवाद के बाद कई विवाद और उभरे। मैच फिक्सिंग का धुँआ भी उठता दिख रहा था लेकिन खबरें दबाई जा रही थी और आईपीएल का नशा लोगों को उस जबरदस्ती से दिया जा रहा था जैसे दोस्त लोग न पीने वाले यार को पहली बार तरह-तरह के टिप्स और ढकोसले देते हुए पिलाते हैं। बाद के दिनों में आखिरकार कुछ खबरें और आई और मैच फिक्सिंग पुख़्ता खबर बन के छाई। श्रीशांत को तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से ही छुट्टी दे दी गई, जिसे हालांकि काफी बाद में बरी भी कर दिया गया। किन्तु अब तो यह खेल सिवाय पैसों के बड़े बिज़नेस के कुछ भी नहीं रह गया है। हालांकि नए दर्शकों ने नए हीरोज के साथ अपने घरौंदे बना लिए हैं, किन्तु अब हमने अपनी मिट्टी इस कीचड़ से ही दूर कर ली है।

अब मजा नहीं आता। अब वो खुमार खत्म हो गया है। जज़्बा अभी भी है लेकिन अब कोई और खेल ढूंढ रहे हैं। सुना है हॉकी में भारत बादशाह है। बिलियर्ड्स में पंकज आडवाणी का नाम ही काफी है। शूटिंग, शतरंज, बैडमिंटन, टेनिस और कबड्डी में भी हमारा शानदार नाम चमक रहा है। एक नया खेल ढूंढना है, जिसमें पैसों से ज्यादा खिलाड़ी की प्रतिभा चमके। जिसमें भारत का जिक्र हो, खिलाड़ियों की गर्लफ्रेंड्स का नहीं। जिसमें शराब के विज्ञापनों से ज्यादा कोच की असली मेहनत का पसीना बोले। जिसमें आने वाले नए भारत का पुरजोर स्वागत हो और पुराने भारत को न्यायसंगत उचित सम्मान। जिसमें राष्ट्रध्वज पर भी उतना ही फ़ख्र हों जितना भारत के पक्ष में बढ़ते स्कोर का। जिसमें भावशून्य होकर एकाग्रता से फिर से एक घरौंदा बनाया जाए, एक ऐसे खेल की तलाश है। गीली मिट्टी और सने हुए हाथों के साथ एक दर्शक के तौर पर क्रिकेट से सन्यास..

- क्रिकेट का एक पुराना वाला दर्शक

Friday, June 23, 2017

पुस्तक समीक्षा : Freedom at Midnight

हाल ही में Dominique Lapierre और Larry Collins की विश्व-विख्यात पुस्तक FREEDOM AT MIDNIGHT फिनिश की। यह पुस्तक इतनी व्यापक इतनी गहन है कि उस दौर के लगभग हर अहम विषय का समावेश किए हुए हैं। फिर भी माउंटबेटन, जिन्ना, नेहरू और गाँधी पर केंद्रित यह पुस्तक इतनी खास लगी कि एक बार इसे 30-40% पढ़कर पुनः वापिस से शुरू करनी पड़ी।

हमारे ही बादशाहों की काली करतूतों, जिन्ना के अलग मुस्लिम राष्ट्र बनाने की ज़िद, माउंटबेटन के चरित्र को अति-सावधानीपूर्वक उकेरते हुए एक हीरो की भांति चित्रित करने, बंटवारे के समय के खून-खराबे में दोनों ओर के लोगों के खून से सने किरदारों, गाँधी जी की हत्या में लिप्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ही कुछ सदस्यों के अलावा जिस खास चीज़ ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह थी गाँधीजी का वह महान जीवन जो यकीनन कोई महात्मा (महान आत्मा) ही जीकर साकार कर सकता है, जो किसी इंसान के बस की बात नहीं। कितने अनिश्चितकालीन अन्न-व्रत, वो साप्ताहिक मौन व्रत, प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति, हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए क्रूर से भी क्रूर बस्तियों में अपने दम पर खुद जाना और वहाँ भाईचारा बहाल करवाना, माउंटबेटन की योजना के विरुद्ध अपने दम पर दो टुकड़े होने जा रहे एक वतन को जोड़े रखने का हर-संभव प्रयत्न कर टूटने की हद पर आ जाना। सच तो यह है कि इस एक किरदार ने पूरी पुस्तक में जान डाल रखी थी।

फिल्मों से इत्तर गर हम गाँधीगिरी को उसकी असली हद तक देखना परखना चाहें तो हमें इसे पुस्तकों में ही पढ़ना होगा। हाल के बरसों में गाँधी जी को बहुत से राजनीतिक और कुण्ठित लोगों ने बदनाम भी करने की कोशिश की है लेकिन ध्रुव तारे को भी क्या कोई धूल-कोई बादल छिपा सकता है भला? हो सके तो इस पुस्तक को पढ़िए, गाँधी को पढ़िए। कुछ ऐसा था जो अब इस वतन में नही रहा। नमन उस महान-आत्मा को...

Tuesday, June 13, 2017

FAN

यों तो दुनिया में लगभग हर देश में लोगों को किसी सेलेब्रिटी या व्यक्ति विशेष का 'फैन' होने का अपना एक शौक है, किन्तु बात जब भारत जैसे 'लोकतांत्रिक' और 'विविधताओं के देश' की हो, तो मामला कुछ और गंभीर हो जाता है। यहाँ हाल के कुछ वर्षों में स्थिति वास्तव में गौर करने लायक है। दरअसल यहाँ के फैन, फैन होने के इस शौक को उस हद तक ले जाते हैं कि कंपीटिशन में विरोधी फैन्स को अपने खेमे में लाने का भरसक प्रयत्न करते हैं और इस खेल में गाली-गलौज तो सामान्य से भी सामान्य बात है, यहाँ तक कि मारपीट और रंजिश तक अंजाम देने लगते हैं।

समाज की ऐसी व्यवस्था में फैन होने का मेरे विचारों में एक ही अर्थ है कि अपने उक्त चहेते आदर्श/सेलेब्रिटी/व्यक्ति विशेष के अवगुणों पर खुद पर्दा डालकर और उन पर उठने वाले हर आपराधिक या नकारात्मक प्रश्न को बिना सत्यता की जाँच तक किए तुरंत दरकिनार कर देना, वहीं दूसरी ओर उनकी हर सकारात्मक बात को और बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार करना। प्रचार करने का यह खेल उस दर्जे तक ले जाना कि खुद झूठे सकारात्मक दावे करना और विरोधियों के झूठे गलत कार्य प्रचारित करना।

इस बात को हम और आप झुठला नहीं सकते। यह हम हर रोज देखते हैं। हमारे हीरो की हर गलत बात अनदेखी करना और झूठी है कह कर उस ओर आँखें मूंद लेना यह सामान्य हो चुका है। ऐसा कहाँ नहीं हो रहा? सच तो यह है कि 'लोकतांत्रिक' और 'विविधताओं के धनी' इस राष्ट्र- भारत की इन्हीं दो विशेषताओं जो इसकी असली परिभाषा के आधार तत्त्व हैं, को हम अब सहन नहीं कर पा रहे और इन्हें ही हम मिटाने को अग्रसर हुए जा रहे हैं। ऐसे में अक्सर यह सोचता हूँ कि आने वाला कल किसी बाहरी नव-आगंतुक को क्या परिभाषा सिखाएगा हमारे भारत की, जब न तो यह लोकतंत्र रहेगा न इसमें कोई विविधता ही बचेगी। या तो यह हिन्दू राष्ट्र बनकर रह जाएगा या फिर मुस्लिम राष्ट्र। या तो भाजपा मुक्त या कांग्रेस मुक्त राष्ट्र। या तो कट्टरपंथी राष्ट्र या पूंजीवादी राष्ट्र। या तो हिंसात्मक राष्ट्र या भ्रष्टाचारी राष्ट्र। या तो धर्मांध राष्ट्र या पाश्चात्य-अंध राष्ट्र।

यही फैन हो जाने की लत हमें वहाँ ले जाएगी जहाँ हम भारत के 'भारत' होने वाले मूल अर्थ को खो देंगे। फैन होना हमें आपस मे झगड़ने को अग्रसर करता है। यह हमें दूसरों पर अपने विचार थोपने को अग्रसर करता है। यह ऐसा धीमा जहर है जो कुछ ही समय मे अपना असर शुरू कर देता है और देखते ही देखते आदत में शुमार हो हमसे वो करवाने लगता है जो हमारे समाज के संस्कारों में भी नहीं है। हमारे समाज मे तो 'आदर्श' तत्व की व्यवस्था है, यह 'फैन' तत्व तो खुद ही मूल-रूप से विदेशी (पश्चिमी) है। आदर्श माने हम किसी को अपना आदर्श मानकर उसके सकारात्मक पहलुओं को अपनाएँ। लेकिन इसमें एक बात का फर्क है। फैन होने पर हममें एक और तत्त्व का इजाफ़ा होता है- 'गर्व'। यहीं गर्व थोड़े समय में, यदि लगाम न कसी जाए तो 'घमंड' में तब्दील हो जाता है। और फिर यहीं घमंड बाद में 'उद्दंडता' में। आदर्शवादी होने में इसी गर्व तत्त्व का अभाव होता है और इसकी बजाय हममें 'परोपकार' तत्त्व का इजाफ़ा होता है जो भारत की हर 'विविधता का मूल' है और जो हमें सच्चा भारतीय बनाता है।

दुनिया हमसे बहुत आगे निकल चुकी है। एक सदी से हम खुद के राष्ट्र के लिए 'विकासशील' शब्द ही सुनते आएँ हैं जो सुनने में बहुत अच्छा लगता है। एक ओर हम अंतरिक्ष मे नए आयाम जरूर स्थापित कर रहे हैं किन्तु वहीं सिक्के का दूसरा पहलू हमारे राष्ट्र में अंग्रेजों के आगम से शुरू हुई गरीबी आज भी पाँव पसारे बैठी है और पड़ोसी राष्ट्रों ने हमारी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर हमेशा एक काली छाया बिठाये रखी है। हम बरसों पुराने हमारे ग्रंथों, हमारे महान पूर्वजों और हमारे महान योद्धाओं जो अब नही रहे के गुणगान में ही जरूरत से ज्यादा खुश नजर आते रहते हैं और अपने वर्तमान को लगातार नजरअंदाज किए हुए हैं। आज किसी का फैन होने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि किसी महान आदर्श के आदर्शवादी होने की भारी जरूरत है। हमारे महान आदर्शों को पढ़िए। सुनी-सुनाई न सुनिए। अपने लिए एक अच्छा आदर्श खोजिए। इसमे वक्त दीजिए। अपनी आँखें खुली रखिए। कुछ दृश्य और कुछ आवाज़ें चुभने भी लगेगी, उन्हें चुभने दीजिए। यह चुभन भी अत्यन्त जरूरी है। फैन मत बनिए।

ऐ मेरे भारत में रहने वाले भाँति-भाँति के फैन्स दोस्तों, आँखों से यह चश्मा उतार लीजिए। हमने हमेशा लुटना ही सीखा है। हमे किसने नहीं लूटा! गजनवी के बाद अंग्रेज, अंग्रेजों के बाद नेता और अब नेताओं के बाद हमारा so called 'Yuth'! आखिरी शब्द पढ़कर कोई आश्चर्य?

यदि हाँ, तो ईमानदारी से इस प्रश्न का जवाब ढूँढिये कि भारत का Yuth होते हुए वर्तमान परिस्थितियों में, बजाय किसी महान हस्ती के आदर्शवादी होने के, आप किस सिलेब्रिटी के FAN हैं..?

Wednesday, April 26, 2017

टीवी : एक आवारा-सा गरीब

आज की तारीख में टीवी देखो तो सैकड़ों चैनल्स और हजारों प्रोग्राम्स मिल जाएंगे। लगभग हर वाहियात विषय तक पर चैनल्स और प्रोग्राम्स है।

इतनी भीड़ में भी एक दूरदर्शन के शो 'किताबनामा' को छोड़ दो तो 'पुस्तकों' पर कहीं भी एक प्रोग्राम तक नहीं मिलता। सच तो यह है कि टीवी अब लगता ही नहीं कि ज्ञान का साधन रहा हो, यह एक आवारा-सा 'गरीब' जान पड़ता है जिसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है।

'नई सड़क' ब्लॉग के लेखक और एनडीटीवी के न्यूज़ एंकर, रविश कुमार अक्सर सच ही कहते हैं, "टीवी कम देखिए।" इस विषय में मेरी ही लिखी चंद पंक्तियाँ याद आती है..

फैला इनका गज़ब व्यापार है,
चैनल आज सौ से भी पार है,
फूहड़ हर ज्ञान और मल्हार है,
ना वो 'सुरभि' ना 'चित्रहार' है..

Saturday, March 18, 2017

छोटी-सी बात.. (भाग-4)

वक़्त की चोटों से छिले ख़्वाब,
हम पुरानी यादों में जीते नवाब..

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कुछ शब्द.. इतने नुकीले होते हैं कि
आने वाली नस्लें भी दर्द ढो रही होती हैं..

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कभी-कभी शब्दों को पोटली में बांधकर रखिए,
बात जो नाज़ुक-सी कहनी हो आँखों ही से कहिए..

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जो ख़्वाब था वो कभी टूट चुका
जो भ्रम था वो अभी रूठ चूका
इक अरमाँ था बाकी कहीं सीने में
अबकी सैलाब में वो भी छूट चुका

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आस्तीनों के सांप.. पाल रखे हैं हम सबने,
और फिर कहते हैं.. हमें दुःख दिया है रब ने..

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किरदार की फ़िकर में सीरत थी संवारनी,
दिल चंचल बुलबुला, कर बैठा आवारगी..

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इक मेरा आईना है जो अपने ही भ्रम पालता है,
इक तेरा चेहरा है जो मुझे हर रोज संवारता है..

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जवानी से थोड़ा आगे चलकर, दो मोड़ थे मुड़ते हुए,
इक चकाचौन्ध-सा, कहीं दूर जाता हुआ,
इक शाँत-सा, कच्चा-सा..
माँ के आँगन की ओर सरकता हुआ..

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कुछ ख़्वाबों का अधूरा रहना भी जरूरी है,
ज़िन्दगी में सब मुकम्मल मिले तो जीना क्या..

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शहनाई बेज़ान सी पड़ी है आज इक कोने में,
संगीत के सब 'सुर' अब 'डिजिटल' हो गए हैं..

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मंदिर की दहलीजों ने भी महसूस किया है,
उदास आँखों के भीतर भी इक दुनिया है..

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खुशियों ने हमेशा एक दूरी से देखा मुझे,
ये तो ग़म थे जिन्होंने सदा अपनाया मुझे..

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पाने को बहुत कुछ न पा सके तुझसे ऐ ज़िन्दगी,
दिल को मगर अब तक जवाँ रखे है क्या ये कम है..

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रंग होली का तो फिर भी उतर जाएगा,
रंग गर मेरा उतरे तुम पर से तो बताना..

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ये कोई मन्नत न थी कि तुमको पा लूँ किसी रोज,
ये उस मंदिर की दहलीज-ओ-दीवारों की ज़िद थी..

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होलियाँ तो कईं आई और गई,
अबकी बार जो चढ़ा है ये रंग न उतरेगा
रहगुजर तो कईं आए और गए,
दिल में लेकिन तुमसा कभी न ठहरेगा..

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कभी-कभी दर्द खुद भी इक दवा-सा लगता है,
टूटा हुआ वो बूढ़ा ख़्वाब भी जवाँ-सा लगता है..

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काँच के बना रखे हैं मन यहाँ हमने,
इक जरा-सी बाहरी खनक और सब चूर..

Wednesday, February 22, 2017

इक शाम ऐसी हो..

इक शाम ऐसी हो,

तुम हो, मैं होऊं, और कोई न हो
नई चाहतें हो, कईं राहतें हो, कोई आहतें न हो,
खुला आकाश हो, प्रेम-विन्यास हो, कोई कयास न हो,
हाथ में हाथ हो, इक-दूजे का साथ हो, कोई बात न हो,
मचलते अरमाँ हो, बरसता समाँ हो, कोई तूफ़ाँ न हो,

इक शाम ऐसी हो..
करवटें हों, सिलवटें हों, कोई आहटें न हो
ज़िन्दगी हो, दिलकशी हो, कोई गमनशीं न हो
दीवानगी हों, तिश्नगी हो, कोई दिलठगी न हो
पूरी मन्नतें हों, नई जन्नतें हों, कोई जिल्लतें न हो
हाँ बस तुम हो, मैं होऊं और कोई न हों..

इक शाम ऐसी हो...

Monday, November 14, 2016

आखिर कौन हूँ मैं..?

इस नश्वर शरीर में यह, आखिर कौन हूँ मैं..?

कुछ अधूरी जिज्ञासाओं का बैरंग-सा कैनवास हूँ मैं
अपने अधूरे रहे सपनों से आगे बढ़ा 'आज' हूँ मैं
पिता के आगे बचपन की वो दबी-सी आवाज हूँ मैं
सबसे शैतान होकर भी अपनी माँ का नाज़ हूँ मैं

अपनी नाकामियों में छिपी इक दबी-सी आस हूँ मैं
अभी तक जो पहना न गया वो नया लिबास हूँ मैं
हाँ कुछ लोगों के लिए उनके गले की फाँस हूँ मैं
बावजूद इसके लेकिन खुदी में बहुत खास हूँ मैं

जो रहा सदा ही उम्मीदी के गुल में गुलशन
संकुचित-सा ठहरा-सा वो इक 'भ्रमर' हूँ मैं
अपने ही अजाबों में ग़मगीन आगे बढ़ता
निर्बाध-सा अविरल-सा वो इक 'भँवर' हूँ मैं

पीछे छूट चुके लम्हों में जीता आया पल हूँ मैं
जिसका अभी आना है बाकी वो नया कल हूँ मैं
कुछ अपनों के छलावों में छला गया छल हूँ मैं
किन्तु फिर भी शान्त झील का नया जल हूँ मैं

दौड़ती-भागती जिंदगी में जैसे गौण हूँ मैं
चीखती आवाजों के शोर में भी मौन हूँ मैं
फिर भी अक्सर यह सोचता रहता हूँ
इस नश्वर शरीर में यह, आखिर कौन हूँ मैं..?