Tuesday, September 27, 2016

छोटी-सी बात... (भाग-3)

कुछ यूं हुआ की आईना सामने था,
हम उसमें खुद को तलाशते रह गए
जिन आँखों को रुलाया था हमने,
उन आँखों में 'वो' हमें तराशते रह गए

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मैंने रास्तों से कहा है पलकें बिछाये रहना
वो जो आएगा किसी सावन से कम नहीं...

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मैं इत्मिनान के लम्हों का इक कोयला,
तुम आगाज़ के हौसलों की दहक मेरी...

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चार दीवारें खड़ी कर देने से आशियाना नहीं बनता
त्याग और हौंसलों से घर को 'घर' बनाना पड़ता है..

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(राजस्थानी भाषा में)
म्हैं जद भी बिण बरगद ने देखूँ हूँ,
लागे है एक जुग खर्च कर'र बाबूजी खड़या है।

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अश्क़ आँखों में दबाया हुआ था,
तल्ख़ी हलक में बांधे हुए थी,
दिमाग की सुनते तो गरजते हम भी,
हमने दिल की नब्ज थामे हुए थी

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कागज़ की खुशबू और स्याही की गहराई न महसूस की
तो फिर आप ज़िन्दगी का स्वाद नहीं जानते।

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कहानी तो रोज ही लिखता है मेरा किरदार,
तुम आ जाओ तो इक कविता मुकम्मल हो..

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तनाव का अर्थ क्या होता है, समय का महत्त्व क्या होता है..
एक सरकारी अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में पूछिए..

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कभी-कभी खुदा से लग के गले
जी-भर रोने का मन करता है..

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कभी-कभी मन भी चिल्लाना चाहता है।
कभी-कभी आँखें भी चीखना चाहती है।

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कभी-कभी असली सुकून,
दर्द के बाद ही मिलता है..

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वक़्त के साथ बदलना तो है लाज़िम लेकिन,
जितना तुम बदले हो, इतना नहीं बदला जाता..

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मंजिलें तो किसी रोज हासिल हो ही जाएगी,
क्यूँ ना तब तक लुत्फ़ रास्तों का उठाया जाए..

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इक कायनात मेरे चारों ओर है
इक कायनात तेरी आँखों में है,
बोलो किसके तिलिस्म में जाऊं..

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'प्यास' क्या होती है मेरे होठों से पूछो,
'तृप्ति' क्या होती है तुम्हारे होठों से पूछो..