Thursday, August 17, 2017

पुस्तक समीक्षा : इश्क़ में शहर होना

..और रविश कुमार की 'इश्क़ में शहर होना' समाप्त की। हिन्दी भाषा में भी प्रयोग की एक प्रयोगशाला लगी - इश्क़ में शहर होना। दरअसल फेसबुक पर लिखे स्टेटस से लगने वाले अहसासों को उतारकर करीब 90 नन्ही-नन्ही कहानियों, बल्कि कहानी भी कुछ बड़ी होती ही है इसलिए कहना चाहिए इन्हीं करीब 90 नन्हे-नन्हे अहसासों को अपनी ही अलग लेखन शैली में न्यूनतम शब्दों में जोड़कर एक नन्ही पुस्तक का सृजन किया है जो फेसबुक फिक्शन श्रृंखला का एक हिस्सा है। इस श्रृंखला को 'लप्रेक' नाम दिया गया है यानी लघु-प्रेम-कथा।

पुस्तक में लेखन शैली तो बेहद पसंद आई लेकिन मूल रूप से यह दिल्ली के भीतर इसके विभिन्न कोनों और प्रसिद्ध स्मारकों एवं हिस्सों पर प्रस्फुटित होते प्रेम-प्रसंगों के छोटे-छोटे कैनवास उकेरती हैं और किसी बाहरी निवासी या यों कहें किसी ऐसे शख़्स जो दिल्ली से रूबरू न हो, के लिए यह बेहद कठिन हो जाती है क्योंकि इस कैनवास के रंग उसकी समझ से कुछ पर हो जाते हैं। यानी यह पुस्तक मुख्य रूप से एक दिल्लीवासी के लिए है। हाँ, दिल्ली जो इस पुस्तक में है वो उन तमाम दिल्लीओं से अलग है जो अन्य लेखकों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में दिखाई है, किन्तु फिर भी यह दिल्ली सिर्फ कल्पना न होकर वाकई वैसी है जैसी असल दिल्ली है।

कहानियों में शब्दों की माँग कुछ और थी और जो लेखक ने शायद इसलिए कम रखी क्यूँकि यह कहानियाँ न होकर अहसास मात्र थे। हर अहसास के साथ विक्रम नायक की चित्रकारी उसे कुछ और गहराई देने की अच्छी कोशिश लगी। पुस्तक के प्रारंभ में प्रस्तावना के तौर पर दिया गया 'शहर का किताब बनना' किसी भी कहानी (अहसास) से ज्यादा अच्छा लगा। आपको पढ़ने के लिए कहना तभी चाहूँगा गर आप दिल्लीवासी हों।

Tuesday, August 15, 2017

पुस्तक समीक्षा : गोदान

..और प्रेमचंद की 'गोदान' समाप्त की। अब तक यों लगा सुनील दत्त, नरगिस, राज कुमार स्टारर 'मदर इंडिया' से बेहतर और दर्दभरी गाथा भारतीय कृषक समाज के संदर्भ में कोई और नहीं, किन्तु एक अरसे से प्रेमचंद की गोदान पढ़ने की इच्छा प्रबल थी और जो कहानी में गोता खाया तो न निकलने की इच्छा हुई न इसने ही निकलने दिया। एक ऐसी गाथा जिसमें हर किरदार बड़ी ही गहराई से उकेरा हुआ मालूम हुआ।


हालांकि इस गाथा में कुछ बातें विशेष थी। पहली तो यह कि इसमें किसी भी किरदार के बारे में शत प्रतिशत यह नही कहा जा सकता कि वह आदर्श या अपराधी, हीरो या विलेन था। एक किरदार कब अपराधी होता है और कब हालात की चोटों से आदर्श बन जाता है यह वाकई सजीव चित्रण-सा उकेरा गया है और पढ़ते ही बनता है। दूसरी बात, पुस्तक के कवर पर सार में यह कहानी होरी पर केंद्रित बताई गई है जबकि मैं इससे असहमत हूँ। इसमें हर किरदार का इतना गहरा असर है कि उसे कमतर नहीं समझा जा सकता। तीसरी बात, ग्रामीण कृषक जीवन की बेहद गहरी कहानी होकर भी यह उतनी ही शहरी दार्शनिक, अखबार संपादक, व्यवसायी, राजनेता और नवयुगीन शहरी नारी की भी गाथा है क्योंकि इसमें उन सबके आचार-विचार तमाम कुंठाओं, लोभ-लालच और हृदय-परिवर्तन सहित समाहित है। चौथी बात यह कि तत्कालीन प्राचीन समय की होकर भी यह गाथा हममें से हर-एक के जीवन को बराबर छूती हुई वर्तमान परिवेश में भी तर्कसंगत हैं और मार्मिक-धार्मिक-चार्मिक किसी भी रूप में आज के भारतीय समाज की भी आईना ही है।


इसे पढ़ने वाले इसे केवल मनोरंजन के लिए पढ़ना चाहे तो यह इस गाथा के लिए अन्याय होगा। यह इसलिए पढ़ी जानी चाहिए कि हम स्वयं को इस आईने में खोजने का प्रयत्न करें और जैसा देख सकते हैं उसे वैसा ही स्वीकार करें। और हाँ, साहित्य के नाम पर साहित्य के अलावा 'सब-कुछ' परोसने वाले और युवा-मन पर छाए आज के चेतन भगत, दुरजोय दत्ता और रविंदर सिंह सरीखे लेखकों के फैन्स को ये पुस्तक नहीं पढ़नी चाहिए, यह उनके लिए सही पुस्तक नहीं हैं और वे केवल निराश ही होंगे।