Sunday, October 27, 2013

गुलिस्ताँ-ऐ-दोस्ती...

उँगलियों से ज्यादा जब मेरी उम्र न थी,
वो स्कूल वाली 'जेल' ज्यादा दूर न थी

हर रिश्ता यहाँ मुझे विरासत में मिला,
बस गुलिस्ताँ-ऐ-दोस्ती जरा फुर्सत में मिला

अब वो जेल भी जेल नहीं रह गयी थी,
मिल गयी तब मुझे इक ज़िन्दगी नयी थी

एक-एक कर मुझे आसमां का हर तारा मिला,
कोई प्यारा, कोई न्यारा तो कोई सहारा मिला

उंच-नीच इस गुलिस्तान में कभी हुई नहीं
यहाँ सब बराबर है, छोटा-बड़ा कोई नहीं

अब बारिश में मेरी कश्ती कभी अकेली नहीं होती,
ज़िन्दगी की कोई भी पहेली अब पहेली नहीं होती

यूँ तो हमेशा मैंने बड़ों की बड़ाई देखी,
बस यारी में ही मैंने प्यार भरी लड़ाई देखी

No comments:

Post a Comment